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पाठ की समझ बनाम पाठक की भूमिका

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लेखक,पाठक, शिक्षक/आलोचक बनाम पाठ का मतलब किसी किताब या पाठ को समझने में पाठक की ख़ुद की भूमिका पर बात करने के लिए मैं स्वयं को यहाँ एक पाठक के रूप में रखना चाहूँगा। मेरा ‘पाठ और किताबों (खासकर साहित्य) से’ सिलसिलेवार एवं व्यवहारिक रूप से परिचय स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही हुआ। अपने अनुभव और समझ के विस्तार की प्रक्रिया में किताबों से जुड़ना मेरे जीवन की बड़ी घटना थी। अलग-अलग विषय थे, पाठ थे और किताबें थीं। उनकी अभिव्यक्ति भी थी। उस दौरान जहाँ अपने पसंदीदा पाठ से जीवन भर चलने वाला रिश्ता बना, साथ ही उन पर चर्चा और व्याख्या का लम्बा दौर भी चला। कक्षा और कक्षा के बाहर एक ही पाठ की कई व्याख्याएं थीं। यदि भाषा-साहित्य की बात करूँ तो ‘साहित्य के शिक्षक’ के अनुसार कई बार मैं सही-सही अनुमान लगा पाया था। लेकिन बहुत सारे मौके ऐसे भी थे जहाँ मेरी ‘पाठ की समझ’ को ख़ारिज भी कर दिया गया। उस वक्त तो यही लगता था कि पाठ के विषय में   शिक्षकों की समझ बेहतर है। उनके अनुभव भी विस्तृत एवं व्यापक हैं। इसलिए वे यह तय कर सकते हैं कि पाठ के संबंध में कौन से विचार सही हैं या कौन नहीं। ‘मूल्यांकन का होना’ इस विचार...

बच्चों के लिए नाटक : 'पक्षी और दीमक'

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एक पुरानी डायरी के अनमने पन्ने जोधपुर 27 मार्च 2018 11 बजकर 39 मिनट अपराह्न पिछले साल सितम्बर महीने में जोधपुर की एक घटना देश की प्रमुख ख़बरों के साथ हेड लाइन बनी थी। जोधपुर में 17 साल की एक लड़की ब्लू-ह्वेल गेम की वजह से कायलाना झील में कूद गई थी। हालाँकि उसे बचा लिया गया था।ऑनलाइन चैलेंज के रूप में रूस से शुरू हुए इस मोबाइल गेम के कारण दुनिया में करीब सौ लोगों की मौत हो चुकी है।जिसकी चपेट में भारत के किशोरवय बालक-बालिकाएं भी हैं।  2009-10  में प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं देहरादून में था।एक रात डिनर के बाद सड़क पर दोस्तों के साथ टहल रहा था।अचानक एक 10-11 साल का लड़का मेरे पास आया और मुझसे पैसे मांगने लगा। वह लगभग गिड़गिड़ा रहा था। मैंने अपनी जेब से उसे कुछ रूपये देने चाहे थे। तभी एक छोटी सी बच्ची जो उस लड़के के पीछे से आई थी ने कहा- ‘इसे पैसे नहीं देना , यह व्हाईटनर पीएगा।‘ यह सुनकर मैं सन्न रह गया था। वर्तमान समय में नशाखोरी एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। युवाओं के साथ-साथ नाजुक आयु वाले किशोरों में तेजी से पनपती नशाखोरी उनके वर्तमान के साथ भविष्य को भी चौपट कर रही है...

नवीन सागर के दो कविता संग्रह

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कुछ महीने पहले बाल पत्रिकाओं के पुराने अंकों को घंटों उलटते -पलटते चकमक पत्रिका का एक पुराना अंक (मई, 2000) हाथ लगा।  अंदर के एक पृष्ठ पर सहसा मैं ठिठक गया। पन्ने पर कवि नवीन सागर को श्रद्धांजलि दी गई थी। शीर्षक था ‘अलविदा नवीन के सागर !’ उस नोट में चकमक पत्रिका में छपी नवीन सागर की पहली कविता (जो अगस्त 1989 में छपी थी ) का जिक्र था। बच्चों के लिए प्रकाशित उनके पहले कविता संग्रह ‘आसमान भी दंग’ (संभावना प्रकाशन) और कहानी संग्रह ‘उसका स्कूल’ का जिक्र भी था। साथ ही दो कविताएं ‘गिरा पानी गिरा पानी’ और ‘रानों नाच रही है’ छपी थीं। ‘रानों नाच रही है’ कविता हस्तलिखित थी और साथ में कवि का बनाया हुआ चित्र भी लगा हुआ था। नवीन सागर को मैंने उनकी चुनिंदा कविताओं के माध्यम से ही जाना है। इस नोट ने उनके बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियों को साझा किया था। इस नोट से ही एक और नयी बात जानने को मिली कि नवीन सागर चित्र भी बनाते थे। जो लोग नवीन सागर के समय में रहे होंगे, उनके पास अवश्य ही ये जानकारियाँ होंगी। ( साभार : चकमक पत्रिका, मई 2000) पत्रिकाओं के बारे ऐसी अनेक बातें हैं, जिसकी वजह से शुरुआत से ...