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जब कहानी का 'शेर' असल में 'बाघ' निकला

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बचपन की स्मृतियों के गलियारे में ज़रा लौटकर देखिए। पंचतंत्र की कहानियाँ हों, दादा-दादी के अनगढ़ किस्से हों या हमारी शुरुआती प्राथमिक कक्षाओं की रंग-बिरंगी किताबें—एक दृश्य हम सबने अपने भीतर गहरे तक दर्ज किया है। घने, स्याह जंगल के बीचों-बीच एक गुफा है। उस गुफा के मुहाने से एक जीव पूरे रौब के साथ बाहर निकलता है। लेखक ने बड़े चाव से लिखा है—"जंगल का राजा शेर दहाड़ा!" लेकिन जब हमारी नज़र उसी पन्ने पर बने जलरंगों से सजे, ढीले ब्रश-स्ट्रोक वाले किसी खूबसूरत चित्र पर पड़ती है, तो वहाँ पीली-नारंगी काया पर काली धारियों वाला एक भव्य 'बाघ' खड़ा दिखाई देता है। हममें से एक बड़ी पीढ़ी इसी दृश्य-विरोधाभास को देखते, पढ़ते और आत्मसात करते हुए बड़ी हुई है। साहित्य, विशेषकर हिंदी पट्टी के लोकमानस और रचना-संसार में 'बाघ' और 'शेर' का यह घालमेल इतना पुराना है कि अब यह एक स्वीकृत रूढ़ि बन चुका है। बड़ों के साहित्य, कविता या अमूर्त मुहावरों में तो इस भाषाई छूट को 'रूपकात्मक सौंदर्य' या काव्यात्मक स्वतंत्रता कहकर अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन जब सवाल बाल साहित्य  का ह...