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नाटक गाँव के नाम ‘नरेंद्रपुर’ है!

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  संस्मरण    नाटक गाँव के नाम ‘नरेंद्रपुर’ है! (नाच उपन्यास की पूर्व पीठिका) (नाच किशोर पाठकों के लिये लिखा गया उपन्यास है , जो इस महीने एकलव्य , भोपाल से प्रकाशित हुआ है। तकरीबन दस साल तक इसपर काम करता रहा। इन वर्षों में इसके अलग-अलग ड्राफ्ट तैयार हुए। पाठकों के सुझाव भी मिले। सहयोग के लिये सभी का शुक्रिया।   वैसे इसके लेखन प्रक्रिया की शुरुआत वर्ष 2016 के आरम्भ में हुई थी। जब मुझे एक कथा शिविर में भाग लेने का मौका मिला था। जिसके अनुभवों को आधार बनाकर एक संस्मरण भी लिखा था , जो कथा शिविर की स्मारिका में साथी कथाकारों के साथ प्रकाशित भी हुआ था यहाँ प्रस्तुत है वह संस्मरण ।)     उस शाम बहुत ही असमंजस की सी स्थिति थी। ऑफिस से लौटकर मैं मेल चेक कर रहा था। एक मेल सिवान में आयोजित होने वाले ‘कथा शिविर’ से संबंधित था। शिविर में शामिल होने के लिए सहमति मांगी गई थी। मुझसे जैसे एकदम नए लेखक के लिए इस तरह का आयोजन एक मौके जैसा था- कुछ सीखने , कुछ समझने और कुछ गुनने बुनने का। बाद में मेल में स्थान का नाम भी था- जीरादेई प्रखंड का ‘नरेंद्रपुर गाँव’। जीरादेई का नाम ...

बच्चों के लिए नाटक : 'पक्षी और दीमक'

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एक पुरानी डायरी के अनमने पन्ने जोधपुर 27 मार्च 2018 11 बजकर 39 मिनट अपराह्न पिछले साल सितम्बर महीने में जोधपुर की एक घटना देश की प्रमुख ख़बरों के साथ हेड लाइन बनी थी। जोधपुर में 17 साल की एक लड़की ब्लू-ह्वेल गेम की वजह से कायलाना झील में कूद गई थी। हालाँकि उसे बचा लिया गया था।ऑनलाइन चैलेंज के रूप में रूस से शुरू हुए इस मोबाइल गेम के कारण दुनिया में करीब सौ लोगों की मौत हो चुकी है।जिसकी चपेट में भारत के किशोरवय बालक-बालिकाएं भी हैं।  2009-10  में प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं देहरादून में था।एक रात डिनर के बाद सड़क पर दोस्तों के साथ टहल रहा था।अचानक एक 10-11 साल का लड़का मेरे पास आया और मुझसे पैसे मांगने लगा। वह लगभग गिड़गिड़ा रहा था। मैंने अपनी जेब से उसे कुछ रूपये देने चाहे थे। तभी एक छोटी सी बच्ची जो उस लड़के के पीछे से आई थी ने कहा- ‘इसे पैसे नहीं देना , यह व्हाईटनर पीएगा।‘ यह सुनकर मैं सन्न रह गया था। वर्तमान समय में नशाखोरी एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। युवाओं के साथ-साथ नाजुक आयु वाले किशोरों में तेजी से पनपती नशाखोरी उनके वर्तमान के साथ भविष्य को भी चौपट कर रही है...