संदेश

Childhood लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बाल साहित्य का घोषणापत्र

चित्र
  बाल साहित्य का घोषणापत्र मनोरंजन नहीं , अनुभव — संरक्षण नहीं , साहस हम यह मानने से इंकार करते हैं कि बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को केवल प्रसन्न रखना है। हम यह भी मानने से इंकार करते हैं कि बचपन एक सरल , निर्दोष और जटिलता-रहित अवस्था है। यह घोषणापत्र उस धारणा के विरुद्ध है जो बच्चों को कमज़ोर , अपूर्ण और असहज सत्य के अयोग्य मानती है—और उस साहित्य के विरुद्ध भी , जो वयस्कों की नैतिक सुविधा के लिये बच्चों की भावनात्मक दुनिया को संकुचित करता है। 1. बचपन कोई कोमल भ्रम नहीं है हम घोषणा करते हैं कि बचपन एक पूर्ण मानवीय अवस्था है— जिसमें भय है , ईर्ष्या है , प्रेम है , द्वंद्व है , अपमान है , अकेलापन है , और प्रश्न हैं। जो समाज यह मानता है कि बच्चे इन अनुभवों से अनभिज्ञ हैं , वह या तो बच्चों को नहीं देखता , या स्वयं को नहीं देखना चाहता। बचपन को निर्दोष कहकर हम उसकी पीड़ा को अदृश्य बना देते हैं। हम इस अदृश्यता को अस्वीकार करते हैं। 2. बच्चों को “बचाने” की भाषा दरअसल नियंत्रण की भाषा है जब हम कहते हैं— “यह विषय बच्चों के लिये ठीक नहीं” तो हमें ईमानदारी से यह स्वी...

जिसने मिलेनियल्स के बचपन में रंग भरे

चित्र
  जिसने मिलेनियल्स के बचपन में रंग भरे   आज सुबह हुई थी जैसे होती है सुबह रोज़   मेट्रो भी अपनी रफ्तार में थी पर मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर एक खबर चमकी उस खबर ने सहसा गुजरते समय को थाम लिया जैसे घड़ी की टिक-टिक एक पल को भूल गई हो वो चला गया जिसने हमारे बचपन में चटख रंग भरे थे , जब बचपन रंगों से भरा होता है ,   तो वह सिर्फ़ बचपन नहीं रहता वह तो जादू हो जाता है।   सहसा महसूस हुआ , आँखों में नमी थी   मेट्रो की खिड़की से गुजरता शहर धुंधला रहा था शायद मेरी उदासी शहर में उतर आई थी और फिर यादें लौट आईं , जैसे कोई पुरानी धुन बज उठी हो    रविवार की वो सुबहें जब दूरदर्शन—उस दौर का एकमात्र टीवी चैनल होता था जब सफ़ेद-श्याम पर्दे पर ‘चल मेरी लूना’ की चुलबुली आवाज़ गूँजती थी तब हम बच्चे ‘साइकिल की सैर’ सपने में देखते थे   । ‘ मिले सुर मेरा तुम्हारा’ तो जैसे जादू बुनता था हम गुनगुनाते थे , कई-कई बार बेतरह जैसे कोई अनकहा नेशनल एंथम हो हमारा तब कौन सोचता था कि इनको रचने वाला एक आदमी है ? वह आदमी , जो हमारे बच...

बाल साहित्य में पैरोडी और तज़मीन — नकल और सृजन का संतुलन

चित्र
बचपन में एक फिल्म देखी थी ‘ अमानुष ’ । उत्तम कुमार को ब्लैक एंड व्ह्वाइट स्क्रीन पर पहली बार देखा था । फिल्म की कहानी क्या थी अब याद नहीं । शायद उस समय भी समझ तो नहीं आई थी । लेकिन एक दो गाने याद रहे । उसकी दो बड़ी वजहें थीं , पहला तो रेडियो पर ‘ दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा ’ अक्सर सुनने को मिल जाता था । दूसरी वजह इस गीत की पैरोडी , जिसे बड़ों की किसी पत्रिका में मैंने उस वक्त पढ़ा था । पढ़ा क्या था , अपने घर में बहुतों को कई बार पढ़कर सुनाया भी था । ‘ फिल्मी गीतों की पैरोडी ’ के अंतर्गत वह गीत छपा था , और कुछ ऐसा था ,   दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बर्बादी की तरफ़ ऐसा मोड़ा      एक भले मानुष को बन मानुष बना के छोड़ा । जितनी बार मैं पढ़ता , बनमानुष शब्द पर पहुंचते ही मेरी हंसी छूट जाती। हमउम्र लोगों (तब उम्र आठ के आसपास थी) की भी हंसी छूटती , वे पत्रिका लेकर उन पंक्तियों को बार-बार पढ़ते और हंसते। लेकिन बड़े लोगों की इस पर कोई खास प्रतिक्रिया मिली हो , या कोई ठहाके वाली हंसी दर्ज की हुई हो , ऐसा याद नहीं. लेकिन उनके टालने वाले भाव जरूर थे , या इस बात की कोशिश कि थोड़...

सबरंग खिलौने

चित्र
(International Day of Play विशेष) क्या बच्चे सचमुच खेल नहीं रहे?  क्या उनके खेलने की जगहें सिकुड़ती जा रही हैं? और वे आजकल कौन से खेल खेलना पसंद करते हैं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं। पहली नज़र में ऐसा लग सकता है कि खेलने की जगहें कम होने और बच्चों के लिए खेल के अवसर घटने की समस्या सिर्फ बड़े शहरों और महानगरों तक ही सीमित है। यहाँ बेतरतीब निर्माण के कारण बच्चों के खेलने की जगहें सिकुड़ती जा रही हैं, और एकल परिवारों की बढ़ती संख्या भी स्वाभाविक रूप से खेलने के मौकों को कम कर रही है। माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों को  हद तक प्रोग्राम्ड  गतिविधियों में शामिल करने का बढ़ता चलन भी उनके अनौपचारिक खेल के समय को छीन रहा है। हालांकि, यह सिर्फ शहरी क्षेत्रों की कहानी नहीं है; ग्रामीण इलाकों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इसकी एक बड़ी वजह बच्चों के पारंपरिक खेलों की कड़ी का कमजोर पड़ना या टूट जाना है, जिससे ग्रामीण परिवेश में भी बच्चों के पास खेलने के उतने सहज अवसर नहीं बचे हैं, जितने पहले हुआ करते थे। हमारे देश में पारंपरिक खेलों की एक समृद्ध विरासत रही ह...