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खुला ख़त: ‘चकमक’ के अगस्त अंक का लाल और प्रकृति का अपना कैलेंडर

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प्रिय संपादकीय टीम , ‘ चकमक’ , बाल-पत्रिकाओं की दुनिया को देखते-समझते मुझे लगभग चार दशक होने वाले हैं और इनमें साढ़े तीन दशक ‘चकमक’ के साथ भी बीते हैं। इस लंबे साथ ने मुझे यह समझने का अवसर दिया है कि बाल-पत्रिका महज़ कुछ पन्नों का संग्रह नहीं होती। वह बच्चे के हाथ में रखी ऐसी खिड़की होती है , जिससे वह अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा और ध्यान से देखना सीखता है। ‘ चकमक’ ने इस भूमिका को लगातार गंभीरता से निभाया है। प्रकृति , विज्ञान , भाषा , कला और रोज़मर्रा के अनुभवों को बच्चों की दुनिया से जोड़ना इसकी विशेषता रही है। इसलिए इसके किसी अंक को पढ़ते हुए हम केवल यह नहीं देखते कि उसमें क्या है , बल्कि यह भी देखते हैं कि वह अपने समय से किस तरह संवाद करता है। इसी संदर्भ में अगस्त 2026 का अंक कई स्तरों पर आकर्षित करता है। ‘ लाल’ को पूरे अंक में एक सूत्र की तरह बरतना संपादकीय रूप से सुंदर प्रयोग है। कबीर की साखी— “ लाली मेरे लाल की , जित देखूँ तित लाल” — से लेकर प्रभात की कविता ‘लाल’ और प्रदीप कृष्ण के आलेख ‘जित देखूँ तित लाल’ तक यह रंग कविता , दर्शन और विज्ञान के बीच आवाजाही करता है। कह...

जहाँ पहाड़ बाहर नहीं, भीतर उगता है : ‘चंद्रपहाड़’ का पुनर्पाठ

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  याद रही किताबें – 05    (पराग रीडाथॉन के दौरान मुझे अब तक सात-आठ उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला है। इनमें विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का ‘चंद्रपहाड़’ भी शामिल है। यह उपन्यास मैं पहले भी पढ़ चुका था, किंतु इस बार पढ़ने का अनुभव कुछ अलग रहा। हिंदी अनुवाद के साथ-साथ मैंने इसके मूल बांग्ला प्रकाशन (1937) के डिजिटल संस्करण को भी देखा। मुझे बांग्ला भाषा का ज्ञान नहीं है, इसलिए मूल पाठ पढ़ पाना संभव नहीं था। फिर भी उस संस्करण तक पहुँचने का मेरा आकर्षण उसके मूल चित्रांकन को देखने का था। पढ़ते-पढ़ते मैं बार-बार दोनों संस्करणों के बीच आता-जाता रहा—एक ओर हिंदी अनुवाद के शब्द थे, दूसरी ओर मूल बांग्ला संस्करण के श्वेत-श्याम रेखाचित्र। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि मैं केवल एक उपन्यास नहीं पढ़ रहा हूँ, बल्कि उसके दो समयों और दो रूपों के साथ संवाद कर रहा हूँ। शब्द और चित्र एक-दूसरे के पूरक बनते गए। मूल चित्रांकन ने कथा के वातावरण, प्रकृति की विराटता और शंकर के अकेलेपन को एक नया दृश्य आयाम दिया, जबकि हिंदी अनुवाद ने उस अनुभव को मेरी अपनी भाषा में आत्मीय बना दिया। शायद इसी कारण इस बार ‘चंद्रपहाड़’ का...