सुनना भी पढ़ना है
कभी-कभी मुझे लगता है कि स्कूल की सबसे सुंदर चीज़ ब्लैकबोर्ड नहीं है। बल्कि वह आवाज़ है, जो कहती है—"एक था राजा..." और अचानक पूरी कक्षा चुप हो जाती है। बच्चों की आँखें कहीं और देख रही होती हैं , पर वे सब उस कहानी के भीतर चले गए होते हैं। हमने पढ़ने को हमेशा आँखों का काम समझा। अक्षर देखना , शब्द जोड़ना , वाक्य समझना। लेकिन एक बच्चा अपनी माँ की गोद में बैठकर पहली कहानी कब पढ़ता है ? तब तो वह अक्षर भी नहीं पहचानता। वह केवल सुनता है। शायद मनुष्य ने पढ़ने से पहले सुनना सीखा था। दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के कुछ शिक्षक पिछले कुछ वर्षों से मुझे इसी बात की याद दिलाते रहे हैं। वे कोई बड़े लेखक नहीं हैं , लेकिन बच्चों के कथा-संसार के लिए बहुत ज़रूरी लोग हैं। वे रोज़ सुबह उपस्थिति लेते हैं , कॉपियाँ जाँचते हैं , बच्चों की समस्यायें सुलझाते हैं और छुट्टी की घंटी बजने तक एक छोटे-से संसार को संभाले रखते हैं। इनमें से बारह-पंद्रह शिक्षकों ने मिलकर एक दिन तय किया कि कहानियाँ लिखी जाएँ। उनके विभाग की भी यही इच्छा थी कि बच्चों को हर रोज़ कहानी सुनाई जाये। फिर उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू किया। ...