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नींद और गलियारा

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( मीनाब शहर की स्कूली बच्चियों से माफ़ी के साथ)   वे लड़कियाँ अब सोती हैं पर यह नींद वह नहीं जिसके बाद सुबह बस्ता कंधे पर लटकता था और स्कूल के गलियारे में पैरों की आहट भर जाती थी।   उनके पास एक कहानी और सुनने की ज़िद थी जैसे जेब में आखिरी कंचा ठिठका रह जाता है , या मेज़ पर आधा गिलास दूध , जिसकी सतह पर उँगली फेरते ही लहरें उठें।   अब वे वहाँ हैं जहाँ दीवारें ख़त्म हो जाती हैं— न स्कूल की , न घर की , बस एक लंबा गलियारा , जो खाली रह गया , पर हँसी वहीं अटकी रह गई है एक हल्की-सी चीज़ की तरह।   कब्र की खामोशी बहुत ठंडी है इतनी ठंडी कि उसे रजाई से भी गर्म नहीं किया जा सकता। वहाँ कोई लोरी नहीं सुनाई देती बस एक बहुत पुरानी घुटन है जिसने उन छोटी लड़कियों की कहानियों को कच्ची नींद में ही रोक दिया।   हवा अब उन गलियारों से गुज़रती है तो उसे वह हँसी नहीं मिलती जो फुसफुसा कर गुजर जाती थी।

बाल साहित्य का घोषणापत्र

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  बाल साहित्य का घोषणापत्र मनोरंजन नहीं , अनुभव — संरक्षण नहीं , साहस हम यह मानने से इंकार करते हैं कि बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को केवल प्रसन्न रखना है। हम यह भी मानने से इंकार करते हैं कि बचपन एक सरल , निर्दोष और जटिलता-रहित अवस्था है। यह घोषणापत्र उस धारणा के विरुद्ध है जो बच्चों को कमज़ोर , अपूर्ण और असहज सत्य के अयोग्य मानती है—और उस साहित्य के विरुद्ध भी , जो वयस्कों की नैतिक सुविधा के लिये बच्चों की भावनात्मक दुनिया को संकुचित करता है। 1. बचपन कोई कोमल भ्रम नहीं है हम घोषणा करते हैं कि बचपन एक पूर्ण मानवीय अवस्था है— जिसमें भय है , ईर्ष्या है , प्रेम है , द्वंद्व है , अपमान है , अकेलापन है , और प्रश्न हैं। जो समाज यह मानता है कि बच्चे इन अनुभवों से अनभिज्ञ हैं , वह या तो बच्चों को नहीं देखता , या स्वयं को नहीं देखना चाहता। बचपन को निर्दोष कहकर हम उसकी पीड़ा को अदृश्य बना देते हैं। हम इस अदृश्यता को अस्वीकार करते हैं। 2. बच्चों को “बचाने” की भाषा दरअसल नियंत्रण की भाषा है जब हम कहते हैं— “यह विषय बच्चों के लिये ठीक नहीं” तो हमें ईमानदारी से यह स्वी...

फ्रेंकेनस्टीन बनाम फ्रेंकेनस्टीन: सृजन की नैतिक अग्नि और अस्तित्व का अनुबंध

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( इस शनिवार नेटफ्लिक्स पर गिलर्मो डेल टोरो की फिल्म ' फ्रेंकेनस्टीन ' देखना हुआ। डेल टोरो की ‘पिनोकियो’ का मुरीद हूँ , अतः इस फिल्म का असर भी गहरा रहा। इतना गहरा कि पिछले दो-तीन दिनों में मैरी शेली का मूल उपन्यास ' फ्रेंकेनस्टीन: द मॉडर्न प्रोमेथियस ' भी पढ़ लिया गया। संक्षेप में कहानी यह है कि विक्टर फ्रेंकेनस्टीन अपनी वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा और मशीनी जटिलताओं के माध्यम से एक निर्जीव देह में प्राण फूँककर एक ' प्राणी ' की रचना करता है। ‘प्राणी’ के भयानक रूप के कारण विक्टर उसे त्याग देता है , जिसके कारण वह प्राणी अकेलेपन और सामाजिक तिरस्कार की पीड़ा को झेलते हुए दुनिया को समझने की कोशिश करता है। यह आलेख उपन्यास और सिनेमा के मिले-जुले अनुभवों पर आधारित है।) एक कमरा होता है ,  जहाँ स्मृतियाँ और भावनाएँ बहुत आहिस्ता से साँस लेती हैं। बच्चे जब उस कमरे में दाखिल होते हैं ,  तो वे सिर्फ दीवारें नहीं देखते ,  बल्कि उस सच को खोज लेते हैं जो उनके भीतर पहले से कहीं दबा हुआ था। वह कमरा पुराना है ,  उसकी दीवारों पर बीते समय की अनुगूँज है ,  लेकिन जैसे ही कल्पना की रोशनी उस प...

चिल्ड्रेन चॉइस: परंपरा, शिल्प और सौंदर्यबोध का प्रश्न

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  लाइब्रेरी एजुकेटर्स के नाम एक खुला पत्र प्रिय लाइब्रेरी एजुकेटर्स साथियों , दिसम्बर महीने में आयोजित ‘ पराग उत्सव में ' आदा पादा ' कविता को लगभग ७००० से अधिक बच्चों द्वारा ' चिल्ड्रेन चॉइस अवार्ड ' के लिये चुने जाने की घोषणा बाल-साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी घटना है ।   बच्चों की सक्रिय भागीदारी और उनकी सामूहिक सहमति का एक स्वर में गूँजना यह दर्शाता है कि हमारे समय में बच्चों के पास चुनाव करने की शक्ति और अवसर , दोनों बढ़ रहे हैं । पिछले वर्ष की ' पराग ऑनर लिस्ट ' से चुने हुए कविता संग्रहों को जब लाइब्रेरीज़ तक ले जाया गया , तब निश्चित रूप से आप सभी का उन रचनाओं को प्रस्तुत करने का तरीका बच्चों की पसंद का एक मुख्य आधार बना होगा । यही बात बार-बार मेरे मन में भी आती रही है । क्योंकि उस सूची में शामिल अन्य कविता की किताबें  भी किसी भी स्तर पर कमतर नहीं थीं — विशेष रूप से ' गप्पू गोला ' और ' कुछ आता न जाता ' जैसी किताबें , जो अपने आप में अनूठी और शिल्प की दृष्टि से अत्यंत मज़बूत थीं । पर यहाँ हमें ठहरकर यह सोचना चाहिये कि क्या बच्चों का यह चुना...