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अपनी आज़ादी के लिए आप कितना दूर जा सकते हैं?

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पिछले एक महीने से लगभग डेयरी उत्पाद लेना बंद कर चुका हूँ। यह नहीं जानता कि यह निर्णय मुझे आगे कहाँ तक ले जाएगा और भविष्य में इसका क्या रूप होगा , लेकिन फ़िलहाल की स्थिति यही है। यह कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था। कई वर्षों से मन में कुछ जमा होता रहा था—कुछ सवाल , कुछ असहमतियाँ , कुछ ऐसी चीज़ें जिन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देखते हुए भी शायद ठीक से देख नहीं पा रहा था। लेकिन किसी निर्णय तक पहुँचने के लिए जिस एक अनुभव की ज़रूरत होती है , वह अनुभव मुझे हांस सांडे की हाल ही में पढ़ी गई इस किताब से मिला - काला बछड़ा @ सफेद बर्फ   अगस्त में संभावना प्रकाशन से इसका हिंदी अनुवाद आया है। नॉर्वे के चर्चित लेखक हांस सांडे की कुछ किताबों से मेरा परिचय पहले भी रहा है। मेंढ़क , आ आओ अब रात , जब मैं लौटा तो घोड़ा जा चुका था , आर्किमिडीज़ और ब्रेड का स्लाइस , प्लम ट्री आदि किताबें हिंदी और अंग्रेज़ी में एकलव्य , भोपाल से प्रकाशित हुई हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से हांस सांडे का लेखन पसंद है। उनकी किताबों में बच्चों के लिए लिखे जाने के बावजूद दुनिया को देखने की एक ऐसी दृष्टि है , जो चीज़ों को उनके...

खुला ख़त: ‘चकमक’ के अगस्त अंक का लाल और प्रकृति का अपना कैलेंडर

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प्रिय संपादकीय टीम , ‘ चकमक’ , बाल-पत्रिकाओं की दुनिया को देखते-समझते मुझे लगभग चार दशक होने वाले हैं और इनमें साढ़े तीन दशक ‘चकमक’ के साथ भी बीते हैं। इस लंबे साथ ने मुझे यह समझने का अवसर दिया है कि बाल-पत्रिका महज़ कुछ पन्नों का संग्रह नहीं होती। वह बच्चे के हाथ में रखी ऐसी खिड़की होती है , जिससे वह अपने आसपास की दुनिया को थोड़ा और ध्यान से देखना सीखता है। ‘ चकमक’ ने इस भूमिका को लगातार गंभीरता से निभाया है। प्रकृति , विज्ञान , भाषा , कला और रोज़मर्रा के अनुभवों को बच्चों की दुनिया से जोड़ना इसकी विशेषता रही है। इसलिए इसके किसी अंक को पढ़ते हुए हम केवल यह नहीं देखते कि उसमें क्या है , बल्कि यह भी देखते हैं कि वह अपने समय से किस तरह संवाद करता है। इसी संदर्भ में अगस्त 2026 का अंक कई स्तरों पर आकर्षित करता है। ‘ लाल’ को पूरे अंक में एक सूत्र की तरह बरतना संपादकीय रूप से सुंदर प्रयोग है। कबीर की साखी— “ लाली मेरे लाल की , जित देखूँ तित लाल” — से लेकर प्रभात की कविता ‘लाल’ और प्रदीप कृष्ण के आलेख ‘जित देखूँ तित लाल’ तक यह रंग कविता , दर्शन और विज्ञान के बीच आवाजाही करता है। कह...

जहाँ पहाड़ बाहर नहीं, भीतर उगता है : ‘चंद्रपहाड़’ का पुनर्पाठ

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  याद रही किताबें – 05    (पराग रीडाथॉन के दौरान मुझे अब तक सात-आठ उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला है। इनमें विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का ‘चंद्रपहाड़’ भी शामिल है। यह उपन्यास मैं पहले भी पढ़ चुका था, किंतु इस बार पढ़ने का अनुभव कुछ अलग रहा। हिंदी अनुवाद के साथ-साथ मैंने इसके मूल बांग्ला प्रकाशन (1937) के डिजिटल संस्करण को भी देखा। मुझे बांग्ला भाषा का ज्ञान नहीं है, इसलिए मूल पाठ पढ़ पाना संभव नहीं था। फिर भी उस संस्करण तक पहुँचने का मेरा आकर्षण उसके मूल चित्रांकन को देखने का था। पढ़ते-पढ़ते मैं बार-बार दोनों संस्करणों के बीच आता-जाता रहा—एक ओर हिंदी अनुवाद के शब्द थे, दूसरी ओर मूल बांग्ला संस्करण के श्वेत-श्याम रेखाचित्र। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि मैं केवल एक उपन्यास नहीं पढ़ रहा हूँ, बल्कि उसके दो समयों और दो रूपों के साथ संवाद कर रहा हूँ। शब्द और चित्र एक-दूसरे के पूरक बनते गए। मूल चित्रांकन ने कथा के वातावरण, प्रकृति की विराटता और शंकर के अकेलेपन को एक नया दृश्य आयाम दिया, जबकि हिंदी अनुवाद ने उस अनुभव को मेरी अपनी भाषा में आत्मीय बना दिया। शायद इसी कारण इस बार ‘चंद्रपहाड़’ का...

साक्षात्कार - पेरुमाल मुरुगन

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बात करीब छह-सात साल पुरानी है। हिंदी के एक लोकप्रिय बाल साहित्यकार ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि सबसे बेहतरीन बाल साहित्य हिंदी में ही लिखा जा रहा है। उनकी यह बात सुनकर मुझे थोड़ी हैरानी तो हुई थी , लेकिन मैं उनसे कुछ कह नहीं पाया ; क्योंकि उस समय तक अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन बाल साहित्य के बारे में मेरी समझ बहुत सीमित थी। बाद में , जब मुझे विभिन्न भाषाओं के बाल साहित्य और उन पर लिखे गये आलेखों को देखने-परखने का अवसर मिला , तब मुझे यह अहसास हुआ कि  हमारे सोचने और पढ़ने का दायरा कितना सिमटा हुआ है। इसी दौरान मुझे पेरुमाल मुरुगन की एक चित्र-पुस्तक पढ़ने का मौका मिला। ' सिर का सालन ' के बाद इस चित्र-पुस्तक ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। और दिलचस्प बात देखिए कि ये दोनों ही चित्र-पुस्तकें मूल रूप से हिंदी की नहीं हैं। पेरुमाल मुरुगन तमिल भाषा के एक बहुत ही प्रतिष्ठित लेखक और विद्वान हैं। वे बच्चों के लिए भी खूब लिखते हैं। मुरुगन जी मुख्य रूप से ग्रामीण जीवन , जाति व्यवस्था की समस्याओं और समाज की कड़वी सच्चाइयों को बहुत ही सीधे और सच्चे रूप में लिखने के लिए जाने जाते हैं।...

जब कहानी का 'शेर' असल में 'बाघ' निकला

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बचपन की स्मृतियों के गलियारे में ज़रा लौटकर देखिए। पंचतंत्र की कहानियाँ हों, दादा-दादी के अनगढ़ किस्से हों या हमारी शुरुआती प्राथमिक कक्षाओं की रंग-बिरंगी किताबें—एक दृश्य हम सबने अपने भीतर गहरे तक दर्ज किया है। घने, स्याह जंगल के बीचों-बीच एक गुफा है। उस गुफा के मुहाने से एक जीव पूरे रौब के साथ बाहर निकलता है। लेखक ने बड़े चाव से लिखा है—"जंगल का राजा शेर दहाड़ा!" लेकिन जब हमारी नज़र उसी पन्ने पर बने जलरंगों से सजे, ढीले ब्रश-स्ट्रोक वाले किसी खूबसूरत चित्र पर पड़ती है, तो वहाँ पीली-नारंगी काया पर काली धारियों वाला एक भव्य 'बाघ' खड़ा दिखाई देता है। हममें से एक बड़ी पीढ़ी इसी दृश्य-विरोधाभास को देखते, पढ़ते और आत्मसात करते हुए बड़ी हुई है। साहित्य, विशेषकर हिंदी पट्टी के लोकमानस और रचना-संसार में 'बाघ' और 'शेर' का यह घालमेल इतना पुराना है कि अब यह एक स्वीकृत रूढ़ि बन चुका है। बड़ों के साहित्य, कविता या अमूर्त मुहावरों में तो इस भाषाई छूट को 'रूपकात्मक सौंदर्य' या काव्यात्मक स्वतंत्रता कहकर अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन जब सवाल बाल साहित्य  का ह...

सुनना भी पढ़ना है

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कभी-कभी मुझे लगता है कि स्कूल की सबसे सुंदर चीज़ ब्लैकबोर्ड नहीं है। बल्कि वह आवाज़ है,  जो कहती है—"एक था राजा..." और अचानक पूरी कक्षा चुप हो जाती है। बच्चों की आँखें कहीं और देख रही होती हैं , पर वे सब उस कहानी के भीतर चले गए होते हैं। हमने पढ़ने को हमेशा आँखों का काम समझा। अक्षर देखना , शब्द जोड़ना , वाक्य समझना। लेकिन एक बच्चा अपनी माँ की गोद में बैठकर पहली कहानी कब पढ़ता है ? तब तो वह अक्षर भी नहीं पहचानता। वह केवल सुनता है। शायद मनुष्य ने पढ़ने से पहले सुनना सीखा था। दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के कुछ शिक्षक पिछले कुछ वर्षों से मुझे इसी बात की याद दिलाते रहे हैं। वे कोई बड़े लेखक नहीं हैं , लेकिन बच्चों के कथा-संसार के लिए बहुत ज़रूरी लोग हैं। वे रोज़ सुबह उपस्थिति लेते हैं , कॉपियाँ जाँचते हैं , बच्चों की समस्यायें सुलझाते हैं और छुट्टी की घंटी बजने तक एक छोटे-से संसार को संभाले रखते हैं। इनमें से बारह-पंद्रह शिक्षकों ने मिलकर एक दिन तय किया कि कहानियाँ लिखी जाएँ। उनके विभाग की भी यही इच्छा थी कि बच्चों को हर रोज़ कहानी सुनाई जाये।   फिर उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू किया। ...