पाठकों की दुनिया
विस्तृत आकाश के नीचे धूप और छाया के अपने-अपने घर बने होते हैं। हम उन्हें देखते तो हैं , पर अक्सर पहचानते नहीं। जैसे लोग अपने कपड़ों से कम और अपने चलने के ढंग से अधिक पहचाने जाते हैं , वैसे ही किताबों के साथ रहने के भी अपने-अपने तरीके होते हैं। किताबों की दुनिया भी कुछ ऐसी ही लगती है—जैसे किसी पुरानी बस्ती के अलग-अलग कोनों में लोग बैठे हों और हर खिड़की से एक अलग मौसम झाँक रहा हो। किताबें सिर्फ़ कागज़ नहीं होतीं। वे ऐसे लम्हे होती हैं जो हाथ छुड़ाकर भाग जाना चाहते हैं , और हम उन्हें अपनी हथेलियों में थामे रखना चाहते हैं। शायद इसी कोशिश में हम पढ़ते भी हैं—और थोड़े-थोड़े बदलते भी हैं। कुछ लोग लगातार पढ़ते हैं। उन्हें देखो तो लगता है जैसे पढ़ना उनके लिए एक काम नहीं , एक स्वाभाविक क्रिया है—जैसे साँस लेना। किताब उनके हाथ में कम और उनके भीतर ज़्यादा होती है। भीड़ भरी बस में खिड़की के पास बैठा कोई पाठक—चारों तरफ़ शोर , धक्का-मुक्की और हलचल है , पर वह एक अलग ही दुनिया में होता है। उसके लिए उस समय सबसे सच्ची जगह वही है , जहाँ किताब उसे ले जाती है। कुछ लोग किताबें सहेजते हैं। वे उन्हें ब...