फ्रेंकेनस्टीन बनाम फ्रेंकेनस्टीन: सृजन की नैतिक अग्नि और अस्तित्व का अनुबंध
( इस शनिवार नेटफ्लिक्स पर गिलर्मो डेल टोरो की फिल्म ' फ्रेंकेनस्टीन ' देखना हुआ। डेल टोरो की ‘पिनोकियो’ का मुरीद हूँ , अतः इस फिल्म का असर भी गहरा रहा। इतना गहरा कि पिछले दो-तीन दिनों में मैरी शेली का मूल उपन्यास ' फ्रेंकेनस्टीन: द मॉडर्न प्रोमेथियस ' भी पढ़ लिया गया। संक्षेप में कहानी यह है कि विक्टर फ्रेंकेनस्टीन अपनी वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा और मशीनी जटिलताओं के माध्यम से एक निर्जीव देह में प्राण फूँककर एक ' प्राणी ' की रचना करता है। ‘प्राणी’ के भयानक रूप के कारण विक्टर उसे त्याग देता है , जिसके कारण वह प्राणी अकेलेपन और सामाजिक तिरस्कार की पीड़ा को झेलते हुए दुनिया को समझने की कोशिश करता है। यह आलेख उपन्यास और सिनेमा के मिले-जुले अनुभवों पर आधारित है।) एक कमरा होता है , जहाँ स्मृतियाँ और भावनाएँ बहुत आहिस्ता से साँस लेती हैं। बच्चे जब उस कमरे में दाखिल होते हैं , तो वे सिर्फ दीवारें नहीं देखते , बल्कि उस सच को खोज लेते हैं जो उनके भीतर पहले से कहीं दबा हुआ था। वह कमरा पुराना है , उसकी दीवारों पर बीते समय की अनुगूँज है , लेकिन जैसे ही कल्पना की रोशनी उस प...