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फ्रेंकेनस्टीन बनाम फ्रेंकेनस्टीन: सृजन की नैतिक अग्नि और अस्तित्व का अनुबंध

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( इस शनिवार नेटफ्लिक्स पर गिलर्मो डेल टोरो की फिल्म ' फ्रेंकेनस्टीन ' देखना हुआ। डेल टोरो की ‘पिनोकियो’ का मुरीद हूँ , अतः इस फिल्म का असर भी गहरा रहा। इतना गहरा कि पिछले दो-तीन दिनों में मैरी शेली का मूल उपन्यास ' फ्रेंकेनस्टीन: द मॉडर्न प्रोमेथियस ' भी पढ़ लिया गया। संक्षेप में कहानी यह है कि विक्टर फ्रेंकेनस्टीन अपनी वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा और मशीनी जटिलताओं के माध्यम से एक निर्जीव देह में प्राण फूँककर एक ' प्राणी ' की रचना करता है। ‘प्राणी’ के भयानक रूप के कारण विक्टर उसे त्याग देता है , जिसके कारण वह प्राणी अकेलेपन और सामाजिक तिरस्कार की पीड़ा को झेलते हुए दुनिया को समझने की कोशिश करता है। यह आलेख उपन्यास और सिनेमा के मिले-जुले अनुभवों पर आधारित है।) एक कमरा होता है ,  जहाँ स्मृतियाँ और भावनाएँ बहुत आहिस्ता से साँस लेती हैं। बच्चे जब उस कमरे में दाखिल होते हैं ,  तो वे सिर्फ दीवारें नहीं देखते ,  बल्कि उस सच को खोज लेते हैं जो उनके भीतर पहले से कहीं दबा हुआ था। वह कमरा पुराना है ,  उसकी दीवारों पर बीते समय की अनुगूँज है ,  लेकिन जैसे ही कल्पना की रोशनी उस प...

चिल्ड्रेन चॉइस: परंपरा, शिल्प और सौंदर्यबोध का प्रश्न

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  लाइब्रेरी एजुकेटर्स के नाम एक खुला पत्र प्रिय लाइब्रेरी एजुकेटर्स साथियों , दिसम्बर महीने में आयोजित ‘ पराग उत्सव में ' आदा पादा ' कविता को लगभग ७००० से अधिक बच्चों द्वारा ' चिल्ड्रेन चॉइस अवार्ड ' के लिये चुने जाने की घोषणा बाल-साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी घटना है ।   बच्चों की सक्रिय भागीदारी और उनकी सामूहिक सहमति का एक स्वर में गूँजना यह दर्शाता है कि हमारे समय में बच्चों के पास चुनाव करने की शक्ति और अवसर , दोनों बढ़ रहे हैं । पिछले वर्ष की ' पराग ऑनर लिस्ट ' से चुने हुए कविता संग्रहों को जब लाइब्रेरीज़ तक ले जाया गया , तब निश्चित रूप से आप सभी का उन रचनाओं को प्रस्तुत करने का तरीका बच्चों की पसंद का एक मुख्य आधार बना होगा । यही बात बार-बार मेरे मन में भी आती रही है । क्योंकि उस सूची में शामिल अन्य कविता की किताबें  भी किसी भी स्तर पर कमतर नहीं थीं — विशेष रूप से ' गप्पू गोला ' और ' कुछ आता न जाता ' जैसी किताबें , जो अपने आप में अनूठी और शिल्प की दृष्टि से अत्यंत मज़बूत थीं । पर यहाँ हमें ठहरकर यह सोचना चाहिये कि क्या बच्चों का यह चुना...

आवाज़ों के आँगन में लौटता बचपन

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  एल्बम का नाम - बैक टू बचपन  संगीतकार - चिन्मयी और जोएल  दिसम्बर का महीना था। वही जो अभी-अभी गया है। मैं एलेक्सा पर गीत टटोल रहा था। अचानक स्पॉटीफाई पर कुछ कविताओं के ऑडियो सुनने को मिले।   मानों कानों में सोंधी-सी आवाज़ें भर गयी हों , जैसे बरसों पुरानी धूल जमी किसी स्लेट पर गीले कपड़े से किसी ने ' बचपन ' लिख दिया हो।   धीरे-धीरे मैं आठ कवितायें सुन गया। पहली कविता ‘ पेड़ तुम दर्ज़ी ’ पहले ही वीडियो के रूप में सबकी जुबान पर चढ़ गया है। सारे गीतों से गुजरते हुए मुझे लगा कि काव्यराग का यह ऑडियो एल्बम , ‘ बैक टू बचपन’ , दरअसल हमारी स्मृतियों के उस बक्से की चाबी है जिसे हम बड़ी उम्र की आपाधापी में कहीं रखकर भूल गये थे। इसमें कविताएँ केवल गायी नहीं गयीं , बल्कि वे सुरों की उँगली पकड़कर हमारे घर की देहरी पर आयी हैं। इस एल्बम की सबसे बड़ी ताकत इसकी कविताओं का वह ' सादगी भरा भारीपन ' है , जो बच्चों के लिये जितना सहज है , बड़ों के लिये उतना ही गहरा। गोपाल कृष्ण कौल , नरेश सक्सेना , श्याम सुशील , सुशील शुक्ल , स्वानंद किरकिरे, वरूण ग्रोवर और विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवियों ने शब्...

गेंद के प्रसंग में (विकुशु को याद करते हुए)

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(विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए युवा कवि अम्लानज्योति गोस्वामी ने यह कविता लिखी है। जो the wire में I entered Vinod Kumar Shukla poem शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यहां इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है।)  मैं एक कविता में दाख़िल हुआ   विनोद कुमार शुक्ल की,   खिड़की खुली थी   और भीतर एक दुनिया थी।   बचपन की क्रिकेट की गेंद ढूँढता,   वही गेंद जिसने एक बार   खिड़की का शीशा तोड़ा था,   जिसके शोर में घरों से लोग निकल आए थे,   और बच्चे भाग गए थे   गलियों की ओर।   अंदर, ठंडी नमी-सी मेज़ है,   किसी की आहट नहीं।   दीवारें छूते हुए मैं चलता हूँ,   घड़ी पुराना समय बता रही है।   वह बच्चा अब अमेरिका में नौकरी करता है,   एक हरे काग़ज़ की तलाश में,   जो उसे वहीं रखेगा हमेशा।   पिता धूप में चलते हुए   शाम में उतर रहे हैं,   पर कुछ रास्ता अभी बाकी है—   कहीं एक क्रिकेट मैच देखना होगा   धूल भरी ...

"मैं एक लेखक होने के साथ-साथ उतना ही रीडर (पाठक) भी हूँ।"

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( प्रस्तुत साक्षात्कार एयर इंडिया की मैगज़ीन NAMASTE.ai के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुआ है। जो लेखक रस्किन रस्किन बॉन्ड से श्राबस्ती अनिंदिता मलिक की बातचीत पर आधारित है। पिछ्ले सप्ताह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा में इसे पढ़ा था। मूल अंग्रेजी के साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। ) 91 साल की उम्र में भी रस्किन बॉन्ड लिखते जा रहे हैं , पढ़ते जा रहे हैं , और जिंदगी के छोटे - छोटे लम्हों में खुशी ढूंढ लेते हैं। वो भारत के सबसे ज़्यादा किताबें लिखने वाले लेखकों में से एक हैं , और आज भी उनकी लेखनी युवा है। सवाल : नई किताब “ अनदर डे इन लैंडौर (Another Day in Landour) ” मुबारक हो ! ये किस तरह की किताब है ? रस्किन बॉन्ड : शुक्रिया ! ये तो एक रोज़नामा या डायरी के पन्ने हैं — पहाड़ों पर मेरी ज़िंदगी , रोज़मर्रा के मशगूलात , और अब बुढ़ापे में आने वाले ख़यालात के बारे में। ये चिंतन वाली डायरी है , जैसे खुद से दिल की बातें। सवाल  : इतने सालों तक लिखने की प्रेरणा कहाँ से आती रही ? रस्किन बॉन्ड  : मुझे लगता है , मैंने लेखन के लिए अपना उत्साह कभी नहीं खोया। और किताबों और साहित्य स...