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साक्षात्कार - पेरुमाल मुरुगन

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बात करीब छह-सात साल पुरानी है। हिंदी के एक लोकप्रिय बाल साहित्यकार ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि सबसे बेहतरीन बाल साहित्य हिंदी में ही लिखा जा रहा है। उनकी यह बात सुनकर मुझे थोड़ी हैरानी तो हुई थी , लेकिन मैं उनसे कुछ कह नहीं पाया ; क्योंकि उस समय तक अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन बाल साहित्य के बारे में मेरी समझ बहुत सीमित थी। बाद में , जब मुझे विभिन्न भाषाओं के बाल साहित्य और उन पर लिखे गये आलेखों को देखने-परखने का अवसर मिला , तब मुझे यह अहसास हुआ कि  हमारे सोचने और पढ़ने का दायरा कितना सिमटा हुआ है। इसी दौरान मुझे पेरुमाल मुरुगन की एक चित्र-पुस्तक पढ़ने का मौका मिला। ' सिर का सालन ' के बाद इस चित्र-पुस्तक ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। और दिलचस्प बात देखिए कि ये दोनों ही चित्र-पुस्तकें मूल रूप से हिंदी की नहीं हैं। पेरुमाल मुरुगन तमिल भाषा के एक बहुत ही प्रतिष्ठित लेखक और विद्वान हैं। वे बच्चों के लिए भी खूब लिखते हैं। मुरुगन जी मुख्य रूप से ग्रामीण जीवन , जाति व्यवस्था की समस्याओं और समाज की कड़वी सच्चाइयों को बहुत ही सीधे और सच्चे रूप में लिखने के लिए जाने जाते हैं।...

जब कहानी का 'शेर' असल में 'बाघ' निकला

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बचपन की स्मृतियों के गलियारे में ज़रा लौटकर देखिए। पंचतंत्र की कहानियाँ हों, दादा-दादी के अनगढ़ किस्से हों या हमारी शुरुआती प्राथमिक कक्षाओं की रंग-बिरंगी किताबें—एक दृश्य हम सबने अपने भीतर गहरे तक दर्ज किया है। घने, स्याह जंगल के बीचों-बीच एक गुफा है। उस गुफा के मुहाने से एक जीव पूरे रौब के साथ बाहर निकलता है। लेखक ने बड़े चाव से लिखा है—"जंगल का राजा शेर दहाड़ा!" लेकिन जब हमारी नज़र उसी पन्ने पर बने जलरंगों से सजे, ढीले ब्रश-स्ट्रोक वाले किसी खूबसूरत चित्र पर पड़ती है, तो वहाँ पीली-नारंगी काया पर काली धारियों वाला एक भव्य 'बाघ' खड़ा दिखाई देता है। हममें से एक बड़ी पीढ़ी इसी दृश्य-विरोधाभास को देखते, पढ़ते और आत्मसात करते हुए बड़ी हुई है। साहित्य, विशेषकर हिंदी पट्टी के लोकमानस और रचना-संसार में 'बाघ' और 'शेर' का यह घालमेल इतना पुराना है कि अब यह एक स्वीकृत रूढ़ि बन चुका है। बड़ों के साहित्य, कविता या अमूर्त मुहावरों में तो इस भाषाई छूट को 'रूपकात्मक सौंदर्य' या काव्यात्मक स्वतंत्रता कहकर अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन जब सवाल बाल साहित्य  का ह...

सुनना भी पढ़ना है

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कभी-कभी मुझे लगता है कि स्कूल की सबसे सुंदर चीज़ ब्लैकबोर्ड नहीं है। बल्कि वह आवाज़ है,  जो कहती है—"एक था राजा..." और अचानक पूरी कक्षा चुप हो जाती है। बच्चों की आँखें कहीं और देख रही होती हैं , पर वे सब उस कहानी के भीतर चले गए होते हैं। हमने पढ़ने को हमेशा आँखों का काम समझा। अक्षर देखना , शब्द जोड़ना , वाक्य समझना। लेकिन एक बच्चा अपनी माँ की गोद में बैठकर पहली कहानी कब पढ़ता है ? तब तो वह अक्षर भी नहीं पहचानता। वह केवल सुनता है। शायद मनुष्य ने पढ़ने से पहले सुनना सीखा था। दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के कुछ शिक्षक पिछले कुछ वर्षों से मुझे इसी बात की याद दिलाते रहे हैं। वे कोई बड़े लेखक नहीं हैं , लेकिन बच्चों के कथा-संसार के लिए बहुत ज़रूरी लोग हैं। वे रोज़ सुबह उपस्थिति लेते हैं , कॉपियाँ जाँचते हैं , बच्चों की समस्यायें सुलझाते हैं और छुट्टी की घंटी बजने तक एक छोटे-से संसार को संभाले रखते हैं। इनमें से बारह-पंद्रह शिक्षकों ने मिलकर एक दिन तय किया कि कहानियाँ लिखी जाएँ। उनके विभाग की भी यही इच्छा थी कि बच्चों को हर रोज़ कहानी सुनाई जाये।   फिर उन्होंने कहानियाँ लिखना शुरू किया। ...

ताला, चाबी और एक बहुत बड़ी चुप्पी

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चकमक , मार्च 2026 में प्रकाशित ' ताला सुधारनेवाला ' कविता के बहाने कविता डायरी स्तंभ पर एक टिप्पणी   एक ताला है। ताला लोहे का बना हुआ है और वह बंद है। ताले के पास एक आदमी खड़ा है जो ताले सुधारता है। वह ताले को अपने कान के पास ले जाता है और कुछ सुनता है। ताले के भीतर से कोई आवाज़ आती होगी जिसे केवल वही सुन सकता है। राजेश जोशी ने इसे देखा और एक कविता लिख दी। ताला ठीक करना केवल एक काम नहीं है। यह ताले के भीतर उतरना है। ताला जब चुप होता है , तो उसकी चुप्पी को भी सुनना पड़ता है। ताला एक तरह की बाधा है। जीवन में भी बहुत सारी बाधाएँ होती हैं जो ताले जैसी दिखती हैं। पर हर ताले के लिये एक चाबी होती है। चाबी एक हुनर है , वह एक धीरज है। चाबी को ताले के भीतर बहुत सावधानी से बिठाना पड़ता है , जैसे किसी उदास आदमी के पास बैठकर उसकी बात सुनी जाती है। नरेश सक्सेना जी ने इस कविता को पढ़ा और एक टिप्पणी लिखी। उन्होंने कहा कि कविता के सीधे-सादे वाक्य धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं। वे इतने बड़े हो जाते हैं कि उनमें पूरा जीवन समा जाता है। वे कहते हैं कि ' चाबी खोना ' कोई छोटी बात नहीं है , यह एक वि...

पहली अप्रैल: एक मज़ाक की खुशबू

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तारीख में  आज   ज़रा आप एक दृश्य के बारे में सोचिये। हज़ारों लोग हैं जो ब्रिटेन में रहते हैं। वे अपना काम-धंधा छोड़कर एक जगह रुक गये हैं। घड़ी में सुबह के 9.40 बजे हैं और वे सब एक साथ हवा में उछल रहे हैं। फिर थोड़ी देर बाद , जब वे ज़मीन पर वापस आते हैं , तो अपनी कलाइयों पर बँधी घड़ियों को देखते हैं और धीरे से मुस्कुरा देते हैं। यह कोई जादू नहीं था , यह तो पहली अप्रैल का एक किस्सा था। पहली अप्रैल यानी वह दिन , जिसे हम मूर्खों का त्योहार कहते हैं। हुआ यह था कि बी.बी.सी. रेडियो पर पैट्रिक मूर नाम के एक आदमी ने सबको भरोसा दिला दिया था। उन्होंने कहा था कि एक खास वक्त पर प्लूटो ग्रह , बृहस्पति के ठीक पीछे से गुज़रेगा। इससे एक ऐसा खिंचाव पैदा होगा कि लोग हवा में उछलेंगे तो उन्हें अपना होना बहुत हल्का महसूस होगा। फिर क्या था! वक्त आते ही लोग उछलने लगे। ताज्जुब तो यह है कि बहुतों ने फोन करके बताया कि उन्हें सचमुच हल्कापन लगा। पर कुछ देर बाद उन्हें याद आया कि अरे , आज तो पहली अप्रैल है! उन्हें लगा कि वे बी.बी.सी. द्वारा मूर्ख बना दिये गये हैं। पहली अप्रैल को हम सब थोड़े ज़्यादा सचेत रहते हैं। ह...

पाठकों की दुनिया

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विस्तृत आकाश के नीचे धूप और छाया के अपने-अपने घर बने होते हैं। हम उन्हें देखते तो हैं , पर अक्सर पहचानते नहीं। जैसे लोग अपने कपड़ों से कम और अपने चलने के ढंग से अधिक पहचाने जाते हैं , वैसे ही किताबों के साथ रहने के भी अपने-अपने तरीके होते हैं। किताबों की दुनिया भी कुछ ऐसी ही लगती है—जैसे किसी पुरानी बस्ती के अलग-अलग कोनों में लोग बैठे हों और हर खिड़की से एक अलग मौसम झाँक रहा हो। किताबें सिर्फ़ कागज़ नहीं होतीं। वे ऐसे लम्हे होती हैं जो हाथ छुड़ाकर भाग जाना चाहते हैं , और हम उन्हें अपनी हथेलियों में थामे रखना चाहते हैं। शायद इसी कोशिश में हम पढ़ते भी हैं—और थोड़े-थोड़े बदलते भी हैं। कुछ लोग लगातार पढ़ते हैं। उन्हें देखो तो लगता है जैसे पढ़ना उनके लिए एक काम नहीं , एक स्वाभाविक क्रिया है—जैसे साँस लेना। किताब उनके हाथ में कम और उनके भीतर ज़्यादा होती है। भीड़ भरी बस में खिड़की के पास बैठा कोई पाठक—चारों तरफ़ शोर , धक्का-मुक्की और हलचल है , पर वह एक अलग ही दुनिया में होता है। उसके लिए उस समय सबसे सच्ची जगह वही है , जहाँ किताब उसे ले जाती है। कुछ लोग किताबें सहेजते हैं। वे उन्हें ब...

गणित रस: बालमन की पगडंडियों पर 10 चित्र पुस्तकों का सफ़र

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एक बच्चा है। वह अपने घर की खिड़की के पास खड़ा है। वह बाहर देख रहा है। खिड़की के उस पार उसे गणित नहीं दिखता। उसे पेड़ दिखते हैं , हवा में उड़ती   हुई   धूल दिखती है और आसमान में तैरते बादल दिखते हैं। उसके लिए दुनिया कोई समीकरण नहीं है। दुनिया तो एक अचरज है—जिसकी अपनी एक महक होती है। जब वह अपनी नन्हीं जेब में हाथ डालता है , तो उसे कुछ गोल पत्थर मिलते हैं। वह उन्हें गिनता नहीं , बस महसूस करता है। वह दुनिया को खेल में , कहानियों में और अपनी कल्पना के रंगों में रँगे चित्रों में खोजता है। आजकल बच्चों की लाइब्रेरीज़ बहुत भरी-भरी दिखती हैं। अलमारियों में हज़ारों किताबें हैं , लेकिन ध्यान से देखें तो कुछ जगहें अब भी खाली नज़र आती हैं। एक समय था जब गणित को कहानियों और कविताओं में पिरोने के अनेक प्रयास   हुए । NCERT, एकलव्य और प्रथम जैसी संस्थाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने पगडंडियाँ   बनायीं । लेकिन समय के साथ गणित धीरे-धीरे कहानियों से दूर होता   गया । वह केवल किताबों के पन्नों पर काली स्याही से लिखी   गयी   गणना बनकर रह   गया । वह साहित्...