बीत रहे कथा कहानियों के दिन (2)
(गतांक से आगे ...) ‘आनंद हमारे जीवन का स्वाभाविक लक्षण है. शिक्षा तभी वास्तविक शिक्षा है जब वह इस आनंद अनुभूति का माध्यम बन सके. जहाँ कहीं भी शिक्षण की क्रिया आनंद विहीन रहेगी , वहाँ आज नहीं तो कल, एक वर्ष में नहीं तो दो वर्षों के बाद , इस दौर में नहीं तो अगले दौर में शिक्षण कार्य निष्फल हो जाएगा!’ - प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री गिजुभाई बधेका के शब्द बहुत तेजी से बदलते सामाजिक ...