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पाठकों की दुनिया

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विस्तृत आकाश के नीचे धूप और छाया के अपने-अपने घर बने होते हैं। हम उन्हें देखते तो हैं , पर अक्सर पहचानते नहीं। जैसे लोग अपने कपड़ों से कम और अपने चलने के ढंग से अधिक पहचाने जाते हैं , वैसे ही किताबों के साथ रहने के भी अपने-अपने तरीके होते हैं। किताबों की दुनिया भी कुछ ऐसी ही लगती है—जैसे किसी पुरानी बस्ती के अलग-अलग कोनों में लोग बैठे हों और हर खिड़की से एक अलग मौसम झाँक रहा हो। किताबें सिर्फ़ कागज़ नहीं होतीं। वे ऐसे लम्हे होती हैं जो हाथ छुड़ाकर भाग जाना चाहते हैं , और हम उन्हें अपनी हथेलियों में थामे रखना चाहते हैं। शायद इसी कोशिश में हम पढ़ते भी हैं—और थोड़े-थोड़े बदलते भी हैं। कुछ लोग लगातार पढ़ते हैं। उन्हें देखो तो लगता है जैसे पढ़ना उनके लिए एक काम नहीं , एक स्वाभाविक क्रिया है—जैसे साँस लेना। किताब उनके हाथ में कम और उनके भीतर ज़्यादा होती है। भीड़ भरी बस में खिड़की के पास बैठा कोई पाठक—चारों तरफ़ शोर , धक्का-मुक्की और हलचल है , पर वह एक अलग ही दुनिया में होता है। उसके लिए उस समय सबसे सच्ची जगह वही है , जहाँ किताब उसे ले जाती है। कुछ लोग किताबें सहेजते हैं। वे उन्हें ब...

गणित रस: बालमन की पगडंडियों पर 10 चित्र पुस्तकों का सफ़र

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एक बच्चा है। वह अपने घर की खिड़की के पास खड़ा है। वह बाहर देख रहा है। खिड़की के उस पार उसे गणित नहीं दिखता। उसे पेड़ दिखते हैं , हवा में उड़ती   हुई   धूल दिखती है और आसमान में तैरते बादल दिखते हैं। उसके लिए दुनिया कोई समीकरण नहीं है। दुनिया तो एक अचरज है—जिसकी अपनी एक महक होती है। जब वह अपनी नन्हीं जेब में हाथ डालता है , तो उसे कुछ गोल पत्थर मिलते हैं। वह उन्हें गिनता नहीं , बस महसूस करता है। वह दुनिया को खेल में , कहानियों में और अपनी कल्पना के रंगों में रँगे चित्रों में खोजता है। आजकल बच्चों की लाइब्रेरीज़ बहुत भरी-भरी दिखती हैं। अलमारियों में हज़ारों किताबें हैं , लेकिन ध्यान से देखें तो कुछ जगहें अब भी खाली नज़र आती हैं। एक समय था जब गणित को कहानियों और कविताओं में पिरोने के अनेक प्रयास   हुए । NCERT, एकलव्य और प्रथम जैसी संस्थाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने पगडंडियाँ   बनायीं । लेकिन समय के साथ गणित धीरे-धीरे कहानियों से दूर होता   गया । वह केवल किताबों के पन्नों पर काली स्याही से लिखी   गयी   गणना बनकर रह   गया । वह साहित्...

नींद और गलियारा

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( मीनाब शहर की स्कूली बच्चियों से माफ़ी के साथ)   वे लड़कियाँ अब सोती हैं पर यह नींद वह नहीं जिसके बाद सुबह बस्ता कंधे पर लटकता था और स्कूल के गलियारे में पैरों की आहट भर जाती थी।   उनके पास एक कहानी और सुनने की ज़िद थी जैसे जेब में आखिरी कंचा ठिठका रह जाता है , या मेज़ पर आधा गिलास दूध , जिसकी सतह पर उँगली फेरते ही लहरें उठें।   अब वे वहाँ हैं जहाँ दीवारें ख़त्म हो जाती हैं— न स्कूल की , न घर की , बस एक लंबा गलियारा , जो खाली रह गया , पर हँसी वहीं अटकी रह गई है एक हल्की-सी चीज़ की तरह।   कब्र की खामोशी बहुत ठंडी है इतनी ठंडी कि उसे रजाई से भी गर्म नहीं किया जा सकता। वहाँ कोई लोरी नहीं सुनाई देती बस एक बहुत पुरानी घुटन है जिसने उन छोटी लड़कियों की कहानियों को कच्ची नींद में ही रोक दिया।   हवा अब उन गलियारों से गुज़रती है तो उसे वह हँसी नहीं मिलती जो फुसफुसा कर गुजर जाती थी।