बाल साहित्य का घोषणापत्र

 


बाल साहित्य का घोषणापत्र

मनोरंजन नहीं, अनुभव — संरक्षण नहीं, साहस


हम यह मानने से इंकार करते हैं कि बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को केवल प्रसन्न रखना है।

हम यह भी मानने से इंकार करते हैं कि बचपन एक सरल, निर्दोष और जटिलता-रहित अवस्था है।

यह घोषणापत्र उस धारणा के विरुद्ध है जो बच्चों को कमज़ोर, अपूर्ण और असहज सत्य के अयोग्य मानती है—और उस साहित्य के विरुद्ध भी, जो वयस्कों की नैतिक सुविधा के लिये बच्चों की भावनात्मक दुनिया को संकुचित करता है।


1. बचपन कोई कोमल भ्रम नहीं है

हम घोषणा करते हैं कि बचपन एक पूर्ण मानवीय अवस्था है—

जिसमें भय है, ईर्ष्या है, प्रेम है, द्वंद्व है, अपमान है, अकेलापन है, और प्रश्न हैं।

जो समाज यह मानता है कि बच्चे इन अनुभवों से अनभिज्ञ हैं, वह या तो बच्चों को नहीं देखता, या स्वयं को नहीं देखना चाहता।

बचपन को निर्दोष कहकर हम उसकी पीड़ा को अदृश्य बना देते हैं।

हम इस अदृश्यता को अस्वीकार करते हैं।


2. बच्चों को “बचाने” की भाषा दरअसल नियंत्रण की भाषा है

जब हम कहते हैं— “यह विषय बच्चों के लिये ठीक नहीं”

तो हमें ईमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए कि अक्सर उसका अर्थ होता है— “यह विषय हमें असहज करता है।”

बाल साहित्य में विषय-चयन की शक्ति वयस्कों के पास है। यह शक्ति तटस्थ नहीं है; यह सत्ता है। और हर सत्ता की तरह, यह भी तय करती है कि कौन-से अनुभव वैध हैं और कौन-से नहीं।

हम इस सत्ता-संतुलन को प्रश्नांकित करते हैं।


3. आनंद कोई चुटकुला नहीं है

हम उस आनंद-परिभाषा को अस्वीकार करते हैं जो हँसी, मनोरंजन और हल्केपन तक सीमित है।

हम उस शिक्षा-दृष्टि को भी अस्वीकार करते हैं जो गंभीरता को आनंद का शत्रु मानती है।

आनंद एक अवस्था है— जहाँ बच्चा अपने अनुभवों से भागता नहीं, जहाँ उसे यह भरोसा मिलता है कि उसके भाव स्वीकार्य हैं।

दुख से भागकर कोई आनंद नहीं आता; दुख को समझकर आता है।

हम ‘गंभीर आनंद’ की अवधारणा के पक्ष में खड़े हैं।


4. गंभीर विषय बच्चों को तोड़ते नहीं, भाषा देते हैं

मृत्यु, वियोग, अस्वीकृति, भय, असफलता— ये विषय बच्चों के जीवन में पहले से मौजूद हैं।

जब साहित्य इनसे आँख चुराता है, तो वह बच्चों को नहीं बचाता— वह उन्हें अकेला छोड़ देता है।

संवेदनशीलता का अर्थ विषयों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें ईमानदारी से प्रस्तुत करना है।

हम डर से नहीं, समझ से लिखने की माँग करते हैं।


5. नैतिक उपदेश साहित्य नहीं है

हम उस बाल साहित्य का विरोध करते हैं जिसमें हर कहानी का एक “सही निष्कर्ष” हो, हर पात्र या तो अच्छा हो या बुरा हो, और हर प्रश्न का एक तय उत्तर हो।

यह साहित्य नहीं—अनुशासन है। यह सोच पैदा नहीं करता—आज्ञाकारिता पैदा करता है।

साहित्य का कार्य उत्तर देना नहीं, प्रश्नों के साथ रहना सिखाना है।

हम बच्चों के सोचने के अधिकार की घोषणा करते हैं।


6. साहित्य का काम बच्चों को सक्षम बनाना है, आज्ञाकारी नहीं

हम यह मानते हैं कि बच्चे असहजता झेल सकते हैं, द्वंद्व समझ सकते हैं, और प्रश्नों के साथ जी सकते हैं।

उन्हें कमतर आँकना उन्हें सुरक्षित बनाना नहीं, उन्हें कमज़ोर बनाना है।

बाल साहित्य का उद्देश्य बच्चों को “अच्छा बच्चा” बनाना नहीं, बल्कि स्वायत्त मनुष्य बनने की दिशा में साथ देना है।


7. भविष्य का बाल साहित्य साहस माँगता है

यह साहस—

बच्चों की भावनाओं को गंभीरता से लेने का साहस

वयस्क असहजता से टकराने का साहस

नैतिक सरलताओं को अस्वीकार करने का साहस

और यह स्वीकार करने का साहस कि साहित्य कभी-कभी असुविधाजनक होता है

हम ऐसे बाल साहित्य की माँग करते हैं जो बच्चों से यह कह सके—

तुम जो महसूस कर रहे हो, वह मानवीय है। और तुम इसके साथ अकेले नहीं हो।”


8. यह एक हस्तक्षेप है, सुझाव नहीं

यह घोषणापत्र कोई मार्गदर्शिका नहीं, कोई सुरक्षित सूची नहीं, कोई नई सेंसरशिप नहीं है।

यह एक हस्तक्षेप है— उस सोच में, उस प्रणाली में, और उस साहित्यिक परंपरा में जो बच्चों को बचाने के नाम पर उन्हें चुप कराती रही है।


अंतिम घोषणा

हम मनोरंजन से इंकार नहीं करते— हम उसे पर्याप्त नहीं मानते।

हम आनंद से इंकार नहीं करते— हम उसे गहरा बनाना चाहते हैं।

हम बाल साहित्य को जीवन से काटकर नहीं, जीवन के साथ जोड़कर देखने की घोषणा करते हैं।

क्योंकि बिना साहस के बाल साहित्य संभव नहीं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

'इल्म' में प्रोफेसर कृष्ण कुमार का व्याख्यान

पाठ की समझ बनाम पाठक की भूमिका

बच्चों के पुस्तकालय: वैश्विक रुझान और बदलता स्वरूप