जहाँ पहाड़ बाहर नहीं, भीतर उगता है : ‘चंद्रपहाड़’ का पुनर्पाठ
याद रही किताबें – 05
(पराग रीडाथॉन के दौरान मुझे अब तक सात-आठ उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला है। इनमें विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का ‘चंद्रपहाड़’ भी शामिल है। यह उपन्यास मैं पहले भी पढ़ चुका था, किंतु इस बार पढ़ने का अनुभव कुछ अलग रहा। हिंदी अनुवाद के साथ-साथ मैंने इसके मूल बांग्ला प्रकाशन (1937) के डिजिटल संस्करण को भी देखा। मुझे बांग्ला भाषा का ज्ञान नहीं है, इसलिए मूल पाठ पढ़ पाना संभव नहीं था। फिर भी उस संस्करण तक पहुँचने का मेरा आकर्षण उसके मूल चित्रांकन को देखने का था।
पढ़ते-पढ़ते
मैं बार-बार दोनों संस्करणों के बीच आता-जाता रहा—एक ओर हिंदी अनुवाद के शब्द थे, दूसरी
ओर मूल बांग्ला संस्करण के श्वेत-श्याम रेखाचित्र। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि मैं केवल
एक उपन्यास नहीं पढ़ रहा हूँ, बल्कि उसके दो समयों और दो रूपों के साथ संवाद कर रहा
हूँ। शब्द और चित्र एक-दूसरे के पूरक बनते गए। मूल चित्रांकन ने कथा के वातावरण, प्रकृति
की विराटता और शंकर के अकेलेपन को एक नया दृश्य आयाम दिया, जबकि हिंदी अनुवाद ने उस
अनुभव को मेरी अपनी भाषा में आत्मीय बना दिया।
शायद इसी
कारण इस बार ‘चंद्रपहाड़’ का पाठ पहले की अपेक्षा अधिक गहरा और अधिक स्मरणीय
लगा। इस लेख में उसी संयुक्त पाठकीय अनुभव की प्रतिध्वनि दर्ज है।)
भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित बाल-उपन्यासों की चर्चा करते हुए एक प्रश्न बार-बार सामने आता है—क्या रोमांच केवल बाहरी घटनाओं का क्रम है, या वह व्यक्ति के भीतर घटने वाली किसी गहरी यात्रा का भी नाम है? विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय का ‘चंद्रपहाड़’ इसी प्रश्न के साथ पढ़ा जाना चाहिए। मूलतः बांग्ला में रचित और हिंदी में अनूदित यह कृति बाल और किशोर पाठकों के सामने एक ऐसे संसार का द्वार खोलती है, जहाँ साहस, प्रकृति और आत्म-खोज अलग-अलग धाराएँ नहीं, बल्कि एक ही नदी के अनेक मोड़ हैं।
कुछ किताबें
अपने समय में नहीं रहतीं, वे समय के भीतर एक रास्ता बना लेती हैं। पीढ़ियाँ बदलती हैं,
पाठक बदलते हैं, लेकिन वे किताबें हर नए पाठक के भीतर फिर से जन्म लेती हैं। ‘चंद्रपहाड़’
ऐसी ही पुस्तक है। इसे पढ़ते हुए लगता है कि हम अफ्रीका के जंगलों की यात्रा पर निकले
हैं, लेकिन पुस्तक समाप्त होते-होते पता चलता है कि यात्रा तो हमारे भीतर शुरू हुई
थी। बाहर का पहाड़ वहीं रहता है, भीतर का पहाड़ थोड़ा-सा बदल जाता है।
शंकर इसी परिवर्तन
का नाम है।
वह किसी महाकाव्य
का नायक नहीं, न किसी लोककथा का अजेय योद्धा। वह एक साधारण युवक है, जिसकी सबसे बड़ी
पूँजी उसकी बेचैन कल्पना है। उसने किताबों में दूर देशों के बारे में पढ़ा है। नक्शों
पर नदियाँ देखी हैं। यात्रियों की स्मृतियों में जंगलों की गंध महसूस की है। उसके भीतर
यह विश्वास जन्म ले चुका है कि दुनिया उतनी नहीं है, जितनी उसके गाँव की पगडंडियाँ
दिखाती हैं। शायद हर बच्चे के भीतर कभी-न-कभी ऐसा ही एक शंकर जन्म लेता है। फर्क केवल
इतना है कि कुछ बच्चे बड़े होकर उसे भूल जाते हैं, और कुछ उसके पीछे चल पड़ते हैं।
अफ्रीका का
जंगल इस उपन्यास में भूगोल नहीं है। वह एक जीवित उपस्थिति है। पेड़ों की छाया, चट्टानों
का मौन, ज्वालामुखी की तपिश, दूर से आती किसी अज्ञात पशु की आवाज़—सब मिलकर ऐसा संसार
रचते हैं जहाँ मनुष्य पहली बार अपनी वास्तविक ऊँचाई जान पाता है। विभूतिभूषण की प्रकृति
मनुष्य के लिए सजाई गई पृष्ठभूमि नहीं है। वह किसी मंच का परदा नहीं, स्वयं मंच है।
मनुष्य उसमें अतिथि की तरह प्रवेश करता है और धीरे-धीरे सीखता है कि प्रकृति को जीता
नहीं जा सकता, केवल समझा जा सकता है।
यही कारण है कि शंकर का संघर्ष किसी शेर, अजगर या दुर्गम पर्वत से अधिक स्वयं से है। जब वह निर्जनता में अकेला होता है, तब उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी उसका भय होता है। वह बार-बार अपने भीतर टूटता है, फिर स्वयं ही अपने को संभालता है। यहीं उपन्यास एक गहरा प्रश्न उठाता है—क्या साहस का अर्थ भय का अभाव है, या भय के साथ आगे बढ़ते रहने की क्षमता?
आज रोमांच का
अर्थ अक्सर तेज़ गति, विस्फोट, पीछा और लगातार बदलते दृश्य मान लिया गया है। ‘चंद्रपहाड़’
इस धारणा को चुपचाप बदल देता है। यहाँ रोमांच प्रतीक्षा में है। मौन में है। उस क्षण
में है जब पाठक को नहीं मालूम कि अगले मोड़ पर क्या मिलेगा। लेखक घटनाओं से अधिक वातावरण
रचते हैं। और वही वातावरण पाठक को कथा के भीतर धीरे-धीरे उतार देता है।
इस उपन्यास
का सबसे मार्मिक पक्ष उसका अकेलापन है। विशाल अफ्रीकी भूभाग के बीच कई बार शंकर के
पास कोई नहीं बचता। ऐसे क्षणों में जंगल बाहर नहीं रहता, भीतर उतर आता है। अँधेरी गुफाएँ
मन की गुफाओं में बदल जाती हैं। रास्ते केवल धरती पर नहीं, आत्मा में भी खोजने पड़ते
हैं। शायद इसी कारण यह उपन्यास रोमांचक होने के साथ-साथ आत्म-अन्वेषण की कथा भी बन
जाता है। विभूतिभूषण बिना किसी दार्शनिक घोषणा के यह बात कह देते हैं कि मनुष्य सबसे
अधिक स्वयं से मिलते समय अकेला होता है।
उनकी भाषा में
एक दुर्लभ दृश्यात्मकता है। वे शब्दों से चित्र नहीं बनाते, वे दृश्य के भीतर हवा भी
छोड़ देते हैं। पाठक केवल जंगल को देखता नहीं, उसकी नमी महसूस करता है। केवल पहाड़
की ऊँचाई नहीं, उसकी चुप्पी भी सुनता है। यही उनकी भाषा का जादू है। वह पाठक की कल्पना
पर अधिकार नहीं करती, उसे धीरे-धीरे विस्तृत करती है। हिंदी अनुवाद भी इस अनुभव को
काफी हद तक सुरक्षित रखता है। अनुवादक ने केवल कथा नहीं पहुँचाई, उसकी लय और उसके मौन
को भी बचाने का प्रयास किया है।
‘चंद्रपहाड़’ के मूल बांग्ला संस्करणों के चित्र इस कृति की आत्मा का एक और विस्तार हैं। वे कहानी को समझाने नहीं आते; वे उसके भीतर पहले से उपस्थित मौन को दृश्य दे देते हैं। श्वेत-श्याम रेखाचित्रों में फैले जंगल, खुरदरे पर्वत, अँधेरी गुफाएँ और उनके बीच एक छोटी-सी मानवीय आकृति—ये चित्र बार-बार स्मरण कराते हैं कि इस कथा का सबसे बड़ा पात्र मनुष्य नहीं, प्रकृति है। चित्रकार ने शंकर को कभी विजेता की मुद्रा में नहीं रखा। वह प्रायः प्रकृति की विराटता के सामने खड़ा एक जिज्ञासु यात्री दिखाई देता है। यही इस उपन्यास का सबसे गहरा दृश्य-विचार भी है।
इन चित्रों
में रंगों का वैभव नहीं है, रेखाओं का अनुशासन है। प्रकाश और छाया का ऐसा संयम है कि
अनकहा अधिक दिखाई देता है। चित्र कथा का पुनरावृत्त नहीं करते; वे उसके भीतर छिपे विस्मय
को आकार देते हैं। बाल-साहित्य में चित्र तभी सार्थक होते हैं, जब वे बच्चे की कल्पना
के लिए जगह छोड़ें। ‘चंद्रपहाड़’ के चित्र यही करते हैं। वे पाठक को बताते नहीं
कि जंगल कैसा है; वे केवल इतना संकेत देते हैं कि जंगल अभी पूरा देखा जाना बाकी है।
आज, जब बच्चों
की अनेक पुस्तकें चमकीले रंगों और दृश्यात्मक आकर्षण पर निर्भर हैं, ‘चंद्रपहाड़’
यह विश्वास जगाता है कि एक सशक्त रेखा भी उतनी ही गहरी स्मृति बना सकती है जितना कोई
रंग। शायद इसलिए इस उपन्यास के चित्र पढ़ने के बाद भी स्मृति में बने रहते हैं। वे
शब्दों के साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहाँ साहित्य और कला एक-दूसरे का हाथ
थाम लेते हैं।
‘चंद्रपहाड़’ का सबसे बड़ा अवदान यह है कि वह बाल और किशोर साहित्य में रोमांच की परिभाषा बदल देता है। वह बताता है कि रोमांच केवल किसी अज्ञात स्थान तक पहुँच जाना नहीं, बल्कि उस यात्रा से बदलकर लौटना भी है। पहाड़ पर चढ़ना उपलब्धि हो सकती है, पर अपने भीतर उगे भय के पहाड़ को पार करना मनुष्य की असली विजय है।
शायद इसी कारण
यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह बच्चों को केवल साहसी बनने की प्रेरणा नहीं
देता, बल्कि जिज्ञासु बने रहने का साहस भी देता है। और संसार में शायद सबसे कठिन काम
यही है—अपनी जिज्ञासा को जीवित रखना। क्योंकि जिस दिन मनुष्य प्रश्न पूछना छोड़ देता
है, उसी दिन उसके भीतर के सारे पहाड़ समतल हो जाते हैं। ‘चंद्रपहाड़’ उन पहाड़ों
को बचाए रखने वाली किताब है।
(Image : Cover - Sahitya Academy 'Chandra Pahad, and Other illustrations from the Bengali adventure novel Chander Pahar (“Mountain of the Moon”) by Bibhutibhushan Bandyopadhyay, first published in 1937.)
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