गणित रस: बालमन की पगडंडियों पर 10 चित्र पुस्तकों का सफ़र
एक बच्चा है। वह अपने घर की खिड़की के पास खड़ा है। वह बाहर देख रहा है।
खिड़की के उस पार उसे गणित नहीं दिखता। उसे पेड़ दिखते हैं, हवा में उड़ती हुई धूल
दिखती है और आसमान में तैरते बादल दिखते हैं। उसके लिए दुनिया कोई समीकरण नहीं है।
दुनिया तो एक अचरज है—जिसकी अपनी एक महक होती है। जब वह अपनी नन्हीं जेब में हाथ
डालता है, तो उसे कुछ गोल पत्थर मिलते हैं। वह उन्हें गिनता
नहीं, बस महसूस करता है। वह दुनिया को खेल में, कहानियों में और अपनी कल्पना के रंगों में रँगे चित्रों में खोजता है।
आजकल बच्चों की लाइब्रेरीज़ बहुत भरी-भरी दिखती हैं।
अलमारियों में हज़ारों किताबें हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो कुछ
जगहें अब भी खाली नज़र आती हैं। एक समय था जब गणित को कहानियों और कविताओं में
पिरोने के अनेक प्रयास हुए। NCERT,
एकलव्य और प्रथम जैसी संस्थाओं ने इस दिशा में महत्वपूर्ण काम किया।
उन्होंने पगडंडियाँ बनायीं।
लेकिन समय के साथ गणित धीरे-धीरे कहानियों से दूर होता गया। वह केवल किताबों के पन्नों पर काली स्याही
से लिखी गयी गणना
बनकर रह गया। वह
साहित्य नहीं बन पाया।
पिछले एक दशक से देशभर में फाउंडेशनल लिटरेसी और न्यूमरेसी
(FLN)
पर बहुत काम हुआ है।
पर जब हम इन प्रयासों को ध्यान से देखते हैं, तो एक बात साफ़
दिखती है—सारा ज़ोर 'साक्षरता' पर है।
अक्षर और कहानियों को लेकर बहुत काम हुआ है, पर 'संख्याज्ञान' के हिस्से में अभी भी एक तरह का सन्नाटा है। इधर एक और बदलाव आया है। अब
गणित सिखाने का अर्थ अक्सर 'तकनीक' से
जोड़ दिया गया है। स्क्रीन पर नाचते अंक और डिजिटल
खेल तो बहुत हैं, लेकिन हाथों से छूकर महसूस की जाने वाली
पिक्चर बुक्स और पढ़ने की सामग्री में गणित कहीं खो गया है। बच्चा टैबलेट पर उँगलियाँ चला रहा
है, पर वह पन्नों को पलटते हुए गणित की खुशबू महसूस नहीं कर
पा रहा। वह तकनीक की भीड़ में है, लेकिन कहानी की सादगी से
दूर।
गणित जब साहित्य बनता है, तो वह डराता नहीं। वह घर की
किसी पुरानी चीज़ की तरह अपना-सा लगता है। मुझे कवि श्रीप्रसाद जी की वह कविता याद
आती है—'सवाल'—
एक बार बोले दादाजी
दो में पाँच घटाओ
और बचे जो, उतने लड्डू
मुझसे लेकर खाओ।
बच्चे बोले, दादाजी
मत बुद्धू हमें बनाओ
दो में पाँच घटेगा कैसे,
लड्डू हमें खिलाओ।
इस कविता की मासूमियत ही गणित का असली चेहरा है। बच्चा यहाँ
हिसाब नहीं कर रहा, वह तो लड्डू के स्वाद को अपनी जीभ पर महसूस
कर रहा है। शायद इसी मासूम चेहरे को फिर से खोजने की हमारी यात्रा 11 जनवरी, 2024 को शुरू हुई।
ओखला फेज़ 3 में उस दिन बाहर कड़ाके की
ठंड रही होगी। मीटिंग हॉल के भीतर हम कुछ लोग बैठे थे। चर्चा इस बात पर थी कि
बच्चों के लिए गणित को कैसे सरल और आत्मीय बनाया जाये। हम चाहते थे कि गणित तकनीक के शोर से
निकलकर कहानियों के एकांत में आये, बच्चों
से बातचीत करे। वहीं से ‘IPEL Numeracy Series’ की बुनियाद रखी गयी।
इन 11 किताबों के लेखक कोई स्थापित साहित्यकार
नहीं थे। वे अध्येता थे—वे 'प्रैक्टिशनर' जो रोज़ बच्चों के साथ बैठते हैं, उनके साथ सीखते
हैं। उनके पास अनुभव बहुत था, लेकिन उसे कहानी के साँचे में
ढालना आसान नहीं था। वे पहली बार लेखक बन रहे थे। उस टीम के साथ मेरा अनुभव वैसा
ही था, जैसे कोई कच्चे आँगन में धूप के उतरने का इंतज़ार कर
रहा हो। मुझे उन लेखक साथियों के भीतर छिपी सादगी और अनुभव को शब्दों में उतारने
में मदद करना था। हमने कई बार बातचीत की, कई बार लिखा गया, और कई बार उसे काटा भी गया। उनके पास गणित की बारीकियाँ थीं; मुझे बस उन बारीकियों को उस खिड़की से बाहर देखना था—जहाँ संख्याएँ किसी
गौरैया की तरह फुदकती हैं।
पिछले कुछ वर्षों से 'इंडिया पार्टनरशिप फॉर अर्ली
लर्निंग' (IPEL) के अंतर्गत विभिन्न राज्यों में काम किया गया। हमने शिक्षण सामग्री तैयार की, कई मेले आयोजित किये। पर
इस बार इच्छा थी कि ऐसी पिक्चर बुक्स तैयार की जाएँ जो तकनीक का विकल्प नहीं,
बल्कि बच्चे का साथी बनें। हमने इस श्रृंखला को नाम दिया— 'गणित रस-बालमन की
कहानियाँ'।
इस पूरे काम में सहयोग युवा साथी इलस्ट्रेटर्स का था। 'आधे'
के विभिन्न संदर्भ क्या हो सकते हैं? एक
आदिवासी गाँव में कितने तरह के पैटर्न छुपे हो सकते हैं? दूर
से कौन सी चीज़ें छोटी दिखाई देती हैं जिनका आकर्षण उनके पास आने से कम नहीं होता?
उधवा ताल के किनारे जमा हुए बच्चे जंगल में किन-किन अलग-अलग
चीज़ों की तलाश करेंगे? जन्मदिन पर मिले किचन सेट को लेकर
क्या नोंक-झोंक होगी? दोपहरी को मेंहदी लगाती दादी अपने पोते
को किस तरह की पहेलियाँ बुझाती हैं? ये कथानक एक तरह से पहली
बार उनके अनुभवों में थे। उन्होंने इस अपेक्षाकृत नये काम को बखूबी अंजाम दिया।
तकरीबन 11 महीने लगे इन किताबों के बनने में। 10
दिसंबर, 2024 को जब 'न्यूमरेसी
इवेंट' में ये किताबें जारी हुईं, तो संतोष शब्दों से परे था। विशेषज्ञों
और शिक्षकों ने इसे बहुत सराहा। तब तय हुआ कि इन्हें स्कूलों तक पहुँचाया जाये। कुछ राज्यों में सहमति भी मिल गयी। पर जीवन कहानियों जैसा सीधा नहीं होता। इस
बीच ऐसा कुछ-कुछ घटित हुआ कि
योजनाएँ फलीभूत नहीं हो पायीं।
वह समय उदासी भरा था। हमने प्रकाशकों की तरफ़ देखा। कुछ ने
दिलचस्पी दिखायी, पर बात अधूरी रही। लेकिन कहानियाँ अपना
रास्ता खुद बनाती हैं। अंततः 'Unboundscript' ने इस श्रृंखला के प्रकाशन का ज़िम्मा लिया। इस मार्च में इस सेट की 10
किताबें सुंदर और आकर्षक छपाई के साथ उपलब्ध भी करा दी गयीं ।
ये
केवल किताबें नहीं हैं। ये उन लेखकों की मेहनत है जिन्होंने पहली बार अपनी कलम को
बच्चों की मुस्कुराहट के लिए इस्तेमाल किया। पुस्तकालयों में गणित आधारित कहानियों
की जो कमी थी, यह उसकी ओर एक छोटा-सा प्रयास है।
सीखना वैसा ही होना चाहिये जैसा चिड़ियों का
चहचहाना—बिल्कुल सहज और प्यारा। अब ये चित्र पुस्तकें आपके और आपकी लाइब्रेरीज़
में जाने के लिये तैयार हैं। अगर इन पन्नों को पलटते हुए आपके बच्चे गणित से दोस्ती कर पायें, तो गणित रस: बालमन की कहानियों की तकरीबन दो सालों की यह यात्रा सफल हुई मानी जायेगी।
🛒 अपनी प्रतियाँ यहाँ से प्राप्त करें: [10 चित्र पुस्तकों का सेट] - अमेज़न से
Unboundscript https://unboundscript.com/
unboundscript@gmail.com
Phone
- +91-8743060284
Address - 2/41 Ansari Road Daryaganj, Delhi - 110002
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