जब कहानी का 'शेर' असल में 'बाघ' निकला

बचपन की स्मृतियों के गलियारे में ज़रा लौटकर देखिए। पंचतंत्र की कहानियाँ हों, दादा-दादी के अनगढ़ किस्से हों या हमारी शुरुआती प्राथमिक कक्षाओं की रंग-बिरंगी किताबें—एक दृश्य हम सबने अपने भीतर गहरे तक दर्ज किया है। घने, स्याह जंगल के बीचों-बीच एक गुफा है। उस गुफा के मुहाने से एक जीव पूरे रौब के साथ बाहर निकलता है। लेखक ने बड़े चाव से लिखा है—"जंगल का राजा शेर दहाड़ा!" लेकिन जब हमारी नज़र उसी पन्ने पर बने जलरंगों से सजे, ढीले ब्रश-स्ट्रोक वाले किसी खूबसूरत चित्र पर पड़ती है, तो वहाँ पीली-नारंगी काया पर काली धारियों वाला एक भव्य 'बाघ' खड़ा दिखाई देता है।

हममें से एक बड़ी पीढ़ी इसी दृश्य-विरोधाभास को देखते, पढ़ते और आत्मसात करते हुए बड़ी हुई है। साहित्य, विशेषकर हिंदी पट्टी के लोकमानस और रचना-संसार में 'बाघ' और 'शेर' का यह घालमेल इतना पुराना है कि अब यह एक स्वीकृत रूढ़ि बन चुका है। बड़ों के साहित्य, कविता या अमूर्त मुहावरों में तो इस भाषाई छूट को 'रूपकात्मक सौंदर्य' या काव्यात्मक स्वतंत्रता कहकर अनदेखा किया जा सकता है, लेकिन जब सवाल बाल साहित्य  का हो, तो हमें ठहरकर सोचना होगा। क्या बच्चों के रचनात्मक संसार में इस वैज्ञानिक अनभिज्ञता या भाषाई आलस को जायज ठहराया जा सकता है?

शायद नहीं। आइए, इस भाषाई पहेली की तह में उतरें और समझें कि यह मासूम सा दिखने वाला घालमेल बच्चों के मानस-पटल पर कितना गहरा असर डालता है।

इस भ्रम की जड़ें हमारे समाज के भाषाई और भौगोलिक बदलावों से जुड़ी हैं। हिंदी में 'शेर' शब्द फारसी के रास्ते आया, जहाँ यह बिल्ली-प्रजाति के किसी भी बड़े, हिंसक और हिंस्र पशु के लिए एक सामान्य संज्ञा की तरह इस्तेमाल होता था। जब यह शब्द भारतीय उपमहाद्वीप की जनभाषाओं में घुला-मिला, तो इसने यहाँ के मूल शास्त्रीय शब्दों—'सिंह' और 'व्याघ्र/बाघ' —के बीच के महीन अंतर को धुंधला कर दिया।

साहित्य में इस जटिलता से बचने के लिए सिंह को 'शेर-ए-बबर' (बब्बर शेर) और बाघ को 'शेर-ए-झाँवर' जैसी उपमाएँ दी तो गईं, लेकिन लोक की ज़बान पर सिर्फ 'शेर' चढ़ा रहा।

इसके साथ एक भौगोलिक यथार्थ भी काम कर रहा था। भारत में एशियाई सिंह कभी एक बड़े भू-भाग पर पाए जाते थे, लेकिन समय के साथ वे सिमटते हुए केवल गुजरात के गिर जंगलों तक सीमित रह गये। देश के बाकी हिस्सों, खासकर उत्तर और पूर्वी भारत के सघन जंगलों में 'बाघ' ही सबसे बड़ा और प्रभावी वन्यजीव बचा। अब दरबारी परिवेश या कस्बों में बैठे जिन लेखकों ने खुद कभी जंगल की सीमाओं में पैर नहीं रखा था, उन्होंने सुनी-सुनाई कहानियों के आधार पर जंगल के इस सबसे ताकतवर जीव (बाघ) को पुकारने के लिए समाज में पहले से मौजूद और रौब के प्रतीक शब्द 'शेर' को ही चुन लिया। यहीं से वह अनभिज्ञता शुरू हुई, जिसने बाद में बाल साहित्य के पन्नों पर अपना घर बना लिया।

शुरुआती बचपन में बच्चे जब भाषा और दृश्यों के माध्यम से अपनी दुनिया की समझ का निर्माण कर रहे होते हैं, तो उनका मस्तिष्क बहुत बारीकी से कड़ियों को जोड़ता है। इस उम्र में संज्ञानात्मक विकास के लिए प्रामाणिकता और यथार्थ का एक बहुत बड़ा महत्व है।

आज का आधुनिक बाल साहित्य बुनियादी तौर पर सचित्र पुस्तकों का संसार है। यहाँ चित्र केवल पन्ने को सजाने के लिए नहीं होते, वे कहानी के सह-यात्री होते हैं। अब जरा उस बच्चे के मानस की कल्पना कीजिए, जो पाठ में पढ़ रहा है 'शेर' (जिसके बारे में उसने कभी सुना या जाना है कि उसकी गर्दन पर घने बाल या अयाल होती है), लेकिन आँखों के सामने चित्र में वह धारियों वाला जीव देख रहा है।

यह स्थिति बच्चे के भीतर एक मानसिक द्वंद्व पैदा करती है। वह समझ नहीं पाता कि वह अपनी आँखों देखे दृश्य पर भरोसा करे या कानों से सुने जा रहे शब्द पर। यह विरोधाभास बच्चे की स्वाभाविक साक्षरता की प्रक्रिया में अनजाने ही एक बाधा बन जाता है।

अक्सर इस विमर्श के विरोध में एक चिरपरिचित तर्क उछाला जाता है—"साहित्य तो कल्पना का अनंत आकाश है, यहाँ इतनी तार्किकता और जीवविज्ञान की क्या ज़रूरत? अगर कहानियों में पेड़-पौधे और पशु-पक्षी इंसानों की तरह बोल सकते हैं, तो बाघ को शेर लिख देने से क्या पहाड़ टूट जाएगा?"

यह तर्क ऊपर से जितना सहज लगता है, भीतर से उतना ही भ्रामक है। कल्पनाशीलता और गलत जानकारी के बीच एक बहुत बारीक लेकिन स्पष्ट विभाजन रेखा होती है।

जब हम पंचतंत्र या किसी आधुनिक कहानी में गौरैया को बगुले से बतियाते दिखाते हैं, तो वह 'फंतासी' है। बच्चे का बाल-मन इस बात को बख़ूबी समझता है कि यह एक जादुई दुनिया है; वह असल जिंदगी में चिड़ियों के बोलने का इंतज़ार नहीं करता। लेकिन जब हम एक वास्तविक, हमारे ईको-सिस्टम में मौजूद जीव की बुनियादी शारीरिक और प्रजातिगत पहचान को ही बदल देते हैं, तो वह कल्पना नहीं, बल्कि एक 'तथ्यात्मक भूल' बन जाती है। बच्चा बड़ा होकर भी इसी गलत जानकारी को सच मानता रहता है। यह बच्चों की सहज जिज्ञासा के साथ एक तरह का भाषाई समझौता है।

शेर और बाघ केवल दिखने में अलग नहीं हैं, उनका पूरा जीवन-दर्शन और सामाजिक ढांचा अलग है:

बाघ एकांतप्रिय जीव है। वह घने जंगलों, दलदली इलाकों और छुपकर शिकार करने वाली जगहों को पसंद करता है। वह अपने एकांत में ही गरिमा पाता है।

जबकि शेर एक सामाजिक प्राणी है। वह 'प्राइड' कहे जाने वाले अपने पूरे कुनबे के साथ खुले मैदानों और शुष्क कँटीले जंगलों में रहता है।

जब हम इन दोनों को एक ही सांचे में ढाल देते हैं, तो प्रकृति की वह अनूठी और विस्मयकारी विविधता बच्चों तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती है।

आज के समय में जब हम पर्यावरण संकट, जंगलों के सिमटने और जैव-विविधता के नुकसान के मुहाने पर खड़े हैं, तब बच्चों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाना महज़ एक शौक नहीं, बल्कि अनिवार्य जिम्मेदारी है। भारत का राष्ट्रीय पशु 'बाघ' है। हमारे देश में 'प्रोजेक्ट टाइगर' जैसी बड़ी मुहिमों का अपना एक इतिहास रहा है। वहीं एशियाई शेरों के संरक्षण का अपना एक अलग संघर्ष है।

यदि हमारा बाल साहित्य ही बचपन में इन दोनों के अंतर को मिटा देगा, तो आने वाली पीढ़ी वन्यजीव संरक्षण के वास्तविक संकटों से कैसे जुड़ पाएगी? जब तक बच्चा यह नहीं जानेगा कि बाघ को बचाने का मतलब घने, अनछुए और सदाबहार जंगलों को बचाना है, तब तक वह पर्यावरण की इस जटिल शृंखला को कभी नहीं समझ पाएगा। बाल साहित्य पर्यावरण चेतना का पहला स्कूल है, और इस स्कूल की बुनियाद ठोस होनी चाहिए।

इस भाषाई रूढ़ि को तोड़ने की सबसे बड़ी और प्राथमिक जिम्मेदारी बाल साहित्य के रचनाकारों और नीति-निर्धारकों की है। अब समय आ गया है कि हम पुरानी अनभिज्ञता को 'परंपरा' का चोगा पहनाकर ढोना बंद करें। इसके लिए कुछ बेहद व्यावहारिक और संवेदी कदम उठाए जा सकते हैं:

लेखकों को अपनी कहानियों में 'बाघ' के लिए 'बाघ' या 'बाघिन' शब्द का ही प्रयोग करना चाहिए। हमारी भाषाएँ इतनी समृद्ध हैं कि वे यथार्थ को पूरी सुंदरता के साथ व्यक्त करने में सक्षम हैं।

हमें बच्चों को "शेर जैसा बहादुर" के घिसे-पिटे मुहावरे से बाहर निकालना होगा। क्यों न हम उन्हें नए बिंब दें—"बाघ जैसी अचूक एकाग्रता," "चीते जैसी अद्वितीय फुर्ती," या "हाथी जैसा गहरा धीरज"? इससे बच्चों का भाषाई संसार भी समृद्ध होगा और प्रकृति को देखने का उनका नज़रिया भी।


किसी भी बाल पत्रिका या पुस्तक के प्रकाशन से पहले संपादकों को टेक्स्ट और इलस्ट्रेशन (चित्रों) के आपसी तालमेल की कड़ाई से जाँच करनी चाहिए। विशेषकर अनुवाद के समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अंग्रेजी के 'Lion' और 'Tiger' का अंधानुकरण न हो।

लेखक और चित्रकार के बीच एक गहरा और आत्मीय संवाद होना चाहिए ताकि जो शब्द पन्नों पर अपनी गूँज छोड़ रहे हैं, वही रंग और रेखाएँ बनकर कागज़ पर साकार हों।

बचपन की स्लेट पर जो रेखाएँ एक बार खिंच जाती हैं, वे उम्र के साथ मिटती नहीं, बल्कि स्थायी धारणाओं का रूप ले लेती हैं। बाल साहित्य का काम केवल मनोरंजन की लोरी सुनाना नहीं है; इसका काम बच्चों के भीतर एक जागरूक, तार्किक, संवेदनशील और खोजी नागरिक के बीज बोना भी है।

साहित्य में बाघ को शेर लिख देना अतीत की एक अनजाने में हुई भूल हो सकती है, लेकिन आज के वैज्ञानिक और जागरूक युग में इसे जारी रखना केवल एक 'भाषाई लापरवाही' कहलाएगा। बच्चों को एक शुद्ध, प्रामाणिक और विस्मय से भरी दुनिया देखने का पूरा अधिकार है—एक ऐसी दुनिया जहाँ जंगल का राजा शेर अपनी घनी अयाल के साथ दहाड़े, और हमारा राष्ट्रीय पशु बाघ अपनी जादुई काली-पीली धारियों के साथ जंगलों में शान से विचरता दिखे। बाल साहित्य को इस यथार्थ और स्पष्टता का स्वागत करना ही होगा।

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