सुनना भी पढ़ना है

कभी-कभी मुझे लगता है कि स्कूल की सबसे सुंदर चीज़ ब्लैकबोर्ड नहीं है। वह आवाज़ है।

एक आवाज़ जो कहती है—"एक था राजा..." और अचानक पूरी कक्षा चुप हो जाती है। बच्चों की आँखें कहीं और देख रही होती हैं, पर वे सब उस कहानी के भीतर चले गए होते हैं।

हमने पढ़ने को हमेशा आँखों का काम समझा। अक्षर देखना, शब्द जोड़ना, वाक्य समझना। लेकिन एक बच्चा अपनी माँ की गोद में बैठकर पहली कहानी कब पढ़ता है? तब तो वह अक्षर भी नहीं पहचानता। वह केवल सुनता है।

शायद मनुष्य ने पढ़ने से पहले सुनना सीखा था।

दिल्ली के एमसीडी स्कूलों के कुछ शिक्षक पिछले कुछ वर्षों से मुझे इसी बात की याद दिलाते रहे हैं। वे कोई बड़े लेखक नहीं हैं। वे रोज़ सुबह उपस्थिति लेते हैं, कॉपियाँ जाँचते हैं, बच्चों की लड़ाइयाँ सुलझाते हैं और छुट्टी की घंटी बजने तक एक छोटे-से संसार को संभाले रखते हैं।

इनमें से बारह-पंद्रह शिक्षकों ने मिलकर एक दिन तय किया कि कहानियाँ लिखी जाएँ।

फिर उन्होंने कहानियाँ लिखीं।

और केवल लिखीं ही नहीं, उन्हें अपनी आवाज़ भी दी।

इस तरह 'आज की कहानी' की शुरुआत हुई।

मुझे हमेशा लगता है कि शिक्षक की आवाज़ में एक अलग तरह का भरोसा होता है। बच्चा उसे केवल सुनता नहीं, पहचानता भी है। जैसे घर लौटते समय कोई परिचित पेड़ दिखाई दे जाए।

इन शिक्षकों ने कुल 107 कहानियाँ तैयार कीं। यह संख्या सुनने में साधारण लग सकती है, पर मैं जानता हूँ कि एक कहानी लिखना कितना कठिन काम है। और जब उसे बच्चे तक पहुँचने लायक बनाना हो, तब वह और कठिन हो जाता है।

इन कहानियों में कुछ बिल्कुल नई हैं। कुछ दिल्ली की लोककथाओं की मिट्टी से निकली हैं। कुछ ऐसी हैं जो बच्चों को यह सिखाती हैं कि दुनिया में हर व्यक्ति एक जैसा नहीं होता, फिर भी सब हमारे अपने हो सकते हैं।

यानी कहानी केवल कहानी नहीं रहती; वह एक छोटा-सा समाज बन जाती है।

साल 2023-24 में IPEL ने इस पहल के साथ जुड़कर इन कहानियों के लेखन और वाचन को और मजबूत बनाने का प्रयास किया। लेकिन सच कहूँ तो मुझे इस पूरी पहल में सबसे सुंदर बात कोई संस्था या परियोजना नहीं लगती। सबसे सुंदर बात यह लगती है कि कुछ शिक्षकों ने अपनी कक्षा की दीवारों से बाहर निकलकर बच्चों के लिए एक नया रास्ता बनाया।

अक्सर हम पढ़ने को केवल अक्षरों से जोड़कर देखते हैं। पर प्राथमिक कक्षाओं के बहुत-से बच्चे अभी शब्दों से जूझ रहे होते हैं। कुछ बच्चों के लिए अक्षरों को पहचानना ही एक बड़ी लड़ाई है।

ऐसे में कहानी उनसे दूर चली जाती है।

ऑडियो कहानी इस दूरी को कम कर देती है।

बच्चा अब अक्षरों से नहीं लड़ रहा होता। वह सीधे कहानी से मिल रहा होता है।

न्यूरोसाइंस के कई शोध यह बताते हैं कि कहानी को सुनने और पढ़ने के दौरान मस्तिष्क के समझने वाले नेटवर्क (comprehension networks) में उल्लेखनीय समानता दिखाई देती है। शोधकर्ता नादिन गाब का कहना है कि पढ़ने और भाषा-समझ से जुड़े मस्तिष्कीय तंत्रों में उतना अंतर नहीं है, जितना सामान्यतः माना जाता है।

2016 में बेथ रोगोव्स्की और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि ऑडियो, ई-टेक्स्ट और दोनों माध्यमों से प्राप्त सामग्री की समझ और स्मृति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले के शोधों में भी यह संकेत मिला कि कहानी को सुनने और पढ़ने के दौरान मस्तिष्क में बनने वाले अर्थगत प्रतिरूप (semantic representations) आश्चर्यजनक रूप से समान होते हैं।

विशेष रूप से डिस्लेक्सिया या पठन-संबंधी कठिनाइयों से जूझ रहे बच्चों के लिए ऑडियो आधारित माध्यम समझ तक पहुँचने का एक महत्वपूर्ण रास्ता बन सकता है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि पढ़कर सुनाने वाली तकनीकें ऐसे बच्चों की समझ में उल्लेखनीय सुधार ला सकती हैं।

मुझे इसके लिए किसी प्रयोगशाला की ज़रूरत नहीं लगती।

एम सी डी विद्मालयों में मैंने बच्चों को कहानी सुनते हुए देखा है।

वे हँसते हैं।

डरते हैं।

सवाल पूछते हैं।

और कभी-कभी कहानी खत्म होने के बाद भी उसके बारे में सोचते रहते हैं।

क्या यही पढ़ना नहीं है?

मुझे लगता है, पढ़ना केवल आँखों का काम नहीं है। पढ़ना दरअसल अर्थ तक पहुँचने का नाम है। और यदि कोई बच्चा अर्थ तक पहुँच रहा है, तो वह पढ़ ही रहा है—चाहे उसके हाथ में किताब हो या कानों में कहानी।

'आज की कहानी' की ये 107 कहानियाँ केवल ऑडियो फाइलें नहीं हैं। इनमें सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का अनुभव है, उनकी कल्पना है, उनकी भाषा है और बच्चों के प्रति उनका विश्वास है।

कभी-कभी बड़े बदलाव बहुत छोटे समूहों से शुरू होते हैं।

यह भी वैसी ही एक शुरुआत है।

किसी कक्षा में बैठा कोई बच्चा अभी शायद अपने शिक्षक की आवाज़ में एक कहानी सुन रहा होगा। वह कहानी उसके कानों से होकर उसके भीतर जा रही होगी।

और संभव है, 

उसी क्षण वह पढ़ भी रहा हो।

बिना किताब खोले।

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