ताला, चाबी और एक बहुत बड़ी चुप्पी



चकमक, मार्च 2026 में प्रकाशित 'ताला सुधारनेवाला' कविता के बहाने कविता डायरी स्तंभ पर एक टिप्पणी 

एक ताला है। ताला लोहे का बना हुआ है और वह बंद है। ताले के पास एक आदमी खड़ा है जो ताले सुधारता है। वह ताले को अपने कान के पास ले जाता है और कुछ सुनता है। ताले के भीतर से कोई आवाज़ आती होगी जिसे केवल वही सुन सकता है। राजेश जोशी ने इसे देखा और एक कविता लिख दी।
ताला ठीक करना केवल एक काम नहीं है। यह ताले के भीतर उतरना है। ताला जब चुप होता है, तो उसकी चुप्पी को भी सुनना पड़ता है। ताला एक तरह की बाधा है। जीवन में भी बहुत सारी बाधाएँ होती हैं जो ताले जैसी दिखती हैं। पर हर ताले के लिये एक चाबी होती है। चाबी एक हुनर है, वह एक धीरज है। चाबी को ताले के भीतर बहुत सावधानी से बिठाना पड़ता है, जैसे किसी उदास आदमी के पास बैठकर उसकी बात सुनी जाती है।
नरेश सक्सेना जी ने इस कविता को पढ़ा और एक टिप्पणी लिखी। उन्होंने कहा कि कविता के सीधे-सादे वाक्य धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं। वे इतने बड़े हो जाते हैं कि उनमें पूरा जीवन समा जाता है। वे कहते हैं कि 'चाबी खोना' कोई छोटी बात नहीं है, यह एक विडंबना है। उन्होंने अंधेरे के बारे में भी एक बात कही। उन्होंने कहा कि अंधेरा खुद में कुछ नहीं होता, वह बस रोशनी की गैर-हाज़िरी है। अगर हम रोशनी लेकर आयें, तो अंधेरा कहीं चला जाता है। समस्याएँ भी अंधेरे जैसी होती हैं। वे डरावनी नहीं होतीं, बस हमें उन्हें देखने का तरीका आना चाहिये।
प्रशांत सोनी ने इस सबके लिये चित्र बनाये हैं। चित्रों में कारीगर का चेहरा बहुत एकाग्र है। उसके हाथ बहुत बारीकी से काम कर रहे हैं। औज़ार बहुत सादे हैं। इन चित्रों को देखकर लगता है कि श्रम करना एक गरिमा की बात है। हाथ जब काम करते हैं, तो वे सुंदर हो जाते हैं।
कविता, टिप्पणी और चित्र—ये तीनों मिलकर एक जगह जमा हो गये हैं। वे बच्चों और बड़ों को एक साथ कुछ सिखा रहे हैं। वे सिखा रहे हैं कि जीवन में किसी ताले को तोड़ना नहीं चाहिये। तोड़ने से ताला खराब हो जाता है। सबसे बड़ा हुनर तो सही चाबी को खोजना है। और जब चाबी मिल जाये, तो उसे ताले के भीतर बहुत प्यार से बिठाना चाहिये।
यही ज्ञान है और यही आशा है। ताला खुल जाता है, तो उसके भीतर की बंद संभावनाएँ बाहर आ जाती हैं। और सब कुछ फिर से सरल हो जाता है। 

 

सामान्यत: एक वयस्क पाठक कविता और अन्य संदर्भों को इसी तरह देखता समझता है। लेकिन यदि यह पूरी सामग्री बच्चों की पत्रिका में प्रकाशित हुई हो, तो इसका पाठ बच्चों के बहाने भी किये जाने की जरूरत महसूस होती है। इसलिये बाल साहित्य के दृष्टिकोण से 'कविता डायरी' में प्रकाशित कविता, कवि का बयान और टिप्पणी पर प्रतिक्रिया (जो कुछ बच्चों से कविता और संबंधित सामग्री के पाठ के साझाकरण और प्रतिक्रिया पर आधारित है) 


एक बच्ची है जो नौ साल की है। नौ साल का होना बहुत छोटा होना नहीं है, पर इतना बड़ा होना भी नहीं है कि उसे ताले के भीतर का 'दार्शनिक अंधेरा' दिखाई देने लगे।

ताला सुधारनेवालाकविता में एक ताला बना हुआ था। ताले के पास एक ताला सुधारनेवाला खड़ा था। ताला सुधारनेवाला ताले के बहुत करीब जाकर कुछ सुनता था। वह ताले की धड़कन सुनता होगा, ऐसा कविता कहती है। बच्ची ने कविता पढ़ी। फिर उसने उसे सुना। फिर उसने कहा कि उसे कुछ समझ नहीं आया। समझ में न आना एक बहुत साफ़ जगह है। वहाँ कोई भीड़ नहीं है।

कविता में एक वरिष्ठ कवि थे। टिप्पणी में एक और बड़े कवि थे। दोनों इतने बड़े हैं कि बच्चे को वे पहाड़ जैसे लगते होंगे। पहाड़ को दूर से देखा जा सकता है, पर पहाड़ पर चढ़ना एक अलग बात है। टिप्पणीकार कह रहे थे कि ताला एक समस्या है। वे कह रहे थे कि अंधेरा कुछ नहीं होता, वह बस रोशनी की गैर-हाज़िरी है। यह सब पढ़कर बच्ची को लगा होगा कि वह किसी क्लास में बैठी है जहाँ पंखा चल रहा है पर हवा नहीं आ रही है।

पहले चकमक पत्रिका में ‘कविता खिड़की’ हुआ करती थी। खिड़की होने का मतलब है कि आप बाहर देख सकते हैं। खिड़की से इब्नबतूता गुज़रते थे। उनका जूता जापान पहुँच जाता था। बच्चे को इब्नबतूता का जूता समझ में आता है क्योंकि जूते में पाँव होते हैं और पाँव चलते हैं। पर ताले के भीतर का 'दार्शनिक अंधेरा' समझ में नहीं आता। विश्व बाल साहित्य के बड़े लेखक सी.एस. लुईस ने एक बार कहा था कि कोई भी कहानी जो केवल बड़ों के दार्शनिक विमर्श के लिये लिखी गयी हो, वह बाल साहित्य नहीं हो सकती। बच्ची की 'नासमझी' इसी बात की गवाही दे रही है।

आजकल बाल साहित्य में बड़े लोग बहुत ज़्यादा आ गये हैं। वे बच्चों के कमरे में घुसकर आपस में बहुत गंभीर बातें करने लगे हैं। वे भूल गये हैं कि कमरा बच्ची का है। वे ‘ऐन्द्रिक क्षमता’ और ‘अमूर्त प्रतीक’ जैसे बड़े-बड़े शब्दों के सूटकेस लेकर आये हैं। बच्ची उन सूटकेसों को देख रही है और सोच रही है कि इनमें उसकी खिड़की कहाँ हैं? यह कविता चाहे उसे जितनी ही समझ आयी , क्या इस बात की गुंजाइश नहीं होनी चाहिये कि बड़ों के बीच थोड़ा उसके विचारों को भी तवज्जो मिले, उसे भी सुना जाये। या बड़ों के बीच उसका कुछ भी कहना बेअदबी ही समझा जायेगा। मॉरिस सेंडाक कहते थे कि बाल साहित्य वह है जो बच्चों को उनकी अपनी भावनाओं को समझने में मदद करे, न कि वह जो बड़ों के दर्शन को बच्चों पर थोपे।

पत्रिका अब ‘कविता डायरी’ लिखती है। डायरी एक बंद चीज़ है। डायरी में ताला लगा होता है। और उस ताले को खोलने के लिये विशेषज्ञ एक बहुत भारी चाबी लेकर खड़े हैं। बच्चे को वह चाबी नहीं चाहिये। उसे तो बस वह ताला चाहिये जिसे वह खुद पटककर देख सके कि उसके भीतर क्या बज रहा है। 

संपादन एक ऐसी क्रिया है जिसमें आपको बहुत छोटा होना पड़ता है। इतना छोटा कि आप नौ साल के बच्चे की आँखों के बराबर आ सकें। अगर संपादक बहुत ऊँचा खड़ा रहेगा, तो वह बच्चे के सिर के ऊपर से निकल जायेगा। बच्चा इंतज़ार कर रहा है कि कब कोई उसे ऐसी कविता सुनायेगा जिसमें ताला खोलने की तकनीक नहीं, बल्कि ताले के साथ खेलने की आज़ादी हो। जैसा कि एस्ट्रिड लिंडग्रेन मानती थीं, लेखक को बच्चों के ऊपर बैठकर नहीं, बल्कि उनके बराबर बैठकर बात करनी चाहिये।

यह ज़रूरी है कि चकमक में फिर से खिड़कियाँ खुलें। डायरियाँ थोड़ी कम हों। क्योंकि खिड़की से धूप आती है और धूप को समझने के लिये किसी दार्शनिक टिप्पणी की ज़रूरत नहीं होती। धूप बस शरीर पर महसूस होती है, जैसे कविता होनी चाहिये। 

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