पहली अप्रैल: एक मज़ाक की खुशबू

तारीख में आज 


ज़रा आप एक दृश्य के बारे में सोचिये। हज़ारों लोग हैं जो ब्रिटेन में रहते हैं। वे अपना काम-धंधा छोड़कर एक जगह रुक गये हैं। घड़ी में सुबह के 9.40 बजे हैं और वे सब एक साथ हवा में उछल रहे हैं। फिर थोड़ी देर बाद, जब वे ज़मीन पर वापस आते हैं, तो अपनी कलाइयों पर बँधी घड़ियों को देखते हैं और धीरे से मुस्कुरा देते हैं। यह कोई जादू नहीं था, यह तो पहली अप्रैल का एक किस्सा था। पहली अप्रैल यानी वह दिन, जिसे हम मूर्खों का त्योहार कहते हैं।

हुआ यह था कि बी.बी.सी. रेडियो पर पैट्रिक मूर नाम के एक आदमी ने सबको भरोसा दिला दिया था। उन्होंने कहा था कि एक खास वक्त पर प्लूटो ग्रह, बृहस्पति के ठीक पीछे से गुज़रेगा। इससे एक ऐसा खिंचाव पैदा होगा कि लोग हवा में उछलेंगे तो उन्हें अपना होना बहुत हल्का महसूस होगा। फिर क्या था! वक्त आते ही लोग उछलने लगे। ताज्जुब तो यह है कि बहुतों ने फोन करके बताया कि उन्हें सचमुच हल्कापन लगा। पर कुछ देर बाद उन्हें याद आया कि अरे, आज तो पहली अप्रैल है! उन्हें लगा कि वे बी.बी.सी. द्वारा मूर्ख बना दिये गये हैं।

पहली अप्रैल को हम सब थोड़े ज़्यादा सचेत रहते हैं। हम डरते हैं कि कहीं कोई हमें मूर्ख न बना दे। यह सब कब शुरू हुआ, यह ठीक-ठीक तो किसी को नहीं पता, पर कहा जाता है कि सोलहवीं शताब्दी के आख़िरी बरसों में फ्रांस में यह रिवाज चलन में आया। सन् 1564 तक यूरोप में नया साल एक अप्रैल से ही शुरू होता था। वह दिन ख़ुशी और उल्लास से भरा होता था, जैसे हमारे यहाँ नया साल होता है। पर फिर फ्रांस के राजा चार्ल्स नवें ने एक नियम बना दिया। उन्होंने कहा कि नया साल एक अप्रैल से नहीं, एक जनवरी से होगा। बहुत से लोग इस बदलाव से खुश नहीं थे। वे पहली अप्रैल को ही अपना नया साल मानते रहे। अब जो लोग बदल गये थे, वे इन न बदलने वालों को चिढ़ाने के लिए झूठे तोहफे देने लगे या उन्हें मूर्ख बनाने लगे। राजा के कहने से तारीख तो बदल गयी, पर पहली अप्रैल को मूर्ख बनाने का वह रिवाज वहीं ठहर गया और आज भी दुनिया में मौजूद है।

यूरोप के देशों में इस दिन बड़ी ठिठोली होती है। फ्रांस में मूर्ख बनने वालों को "पाइजन द एवरिल" या 'अप्रैल-फिश' कहा जाता था। स्कॉटलैंड में इसका नाम "गाऊक" है। इटली में इसे समानता का दिन मानते हैं। बहुत पहले बेबीलोन में "पैराजेक" देवता के सामने ग्यारह दिनों तक ऐसा त्योहार चलता था, जिसमें चौथे दिन राजा भी शामिल होता था। पुराने समय में "साटर नेलिया" नाम का एक त्योहार सात दिन चलता था। वहाँ एक नकली राजा चुना जाता था जो मूर्खता भरी आज्ञाएँ देता था और लोग उन्हें मानते भी थे।

यह परंपरा आज भी वैसी ही बनी हुई है। कभी-कभी तो ऐसी घोषणाएँ होती हैं कि हज़ारों लोग एक साथ मूर्ख बन जाते हैं। अखबार और रेडियो भी इसमें पीछे नहीं रहते। एक बार बी.बी.सी. के रिचर्ड डिम्बले ने टी.वी. पर एक फिल्म दिखायी। उसमें दिखाया कि इटली में स्पैगेटी पेड़ों पर उग रही है और हवा से फैल रही है। हज़ारों लोगों ने इस पर यकीन कर लिया क्योंकि डिम्बले एक बड़े आदमी थे। एक और कार्यक्रम में एक कुत्ते को कार चलाते दिखाया गया। लोग नाराज़ होकर फोन करने लगे कि कुत्तों को सड़क पर कार नहीं चलाने देनी चाहिए, जबकि कुत्ता तो बस सीट पर बैठा था और कार रस्सी से खींची जा रही थी।


जापान में भी एक बार अखबार ने खबर छाप दी कि टोक्यो का बेसबाल स्टेडियम कहीं और ले जाया जाएगा क्योंकि वह एक पुरानी कब्रगाह पर बना है। लोग सच मानकर अधिकारियों के पास पहुँच गये, तब पता चला कि यह तो बस पहली अप्रैल थी। श्रीलंका के एक अखबार "द दावासा" ने तो इनाम का लालच दे दिया। उन्होंने कहा कि जो पहेली का हल लेकर दोपहर से पहले दफ्तर आएगा, उसे दस हज़ार रुपये मिलेंगे। जब दो हज़ार लोग पैसे माँगने पहुँच गये तो पुलिस बुलानी पड़ी। मज़ाक भारी पड़ गया था।


पर क्या आप जानते हैं कि पहली अप्रैल को कुछ बहुत ज़रूरी काम भी हुए हैं? इसी दिन सन् 1935 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपना काम शुरू किया। सन् 1957 की पहली अप्रैल को ही हमारे यहाँ पैसों की दशमलव पद्धति शुरू हुई। अगर वह न होती, तो हम आज भी आना और पाई के हिसाब में उलझे होते। सन् 1988 में इसी दिन लोक शिकायत निदेशालय बना। और सन् 1989 की पहली अप्रैल को नामीबिया की आज़ादी की प्रक्रिया शुरू हुई।

जिस दिन दुनिया मज़ाक कर रही थी, उसी दिन एक देश अपनी आज़ादी की ठोस ज़मीन तैयार कर रहा था। यह सोचना कितना सुखद है।


संदर्भ : बालहंंस, अप्रैल 1, 1990  

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