नींद और गलियारा



(मीनाब शहर की स्कूली बच्चियों से माफ़ी के साथ)

 

वे लड़कियाँ अब सोती हैं

पर यह नींद वह नहीं

जिसके बाद सुबह बस्ता कंधे पर लटकता था

और स्कूल के गलियारे में पैरों की आहट भर जाती थी।

 

उनके पास एक कहानी और सुनने की ज़िद थी

जैसे जेब में आखिरी कंचा ठिठका रह जाता है,

या मेज़ पर आधा गिलास दूध,

जिसकी सतह पर उँगली फेरते ही लहरें उठें।

 

अब वे वहाँ हैं जहाँ दीवारें ख़त्म हो जाती हैं—

न स्कूल की, न घर की,

बस एक लंबा गलियारा,

जो खाली रह गया,

पर हँसी वहीं अटकी रह गई है

एक हल्की-सी चीज़ की तरह।

 

कब्र की खामोशी बहुत ठंडी है

इतनी ठंडी कि उसे रजाई से भी गर्म नहीं किया जा सकता।

वहाँ कोई लोरी नहीं सुनाई देती

बस एक बहुत पुरानी घुटन है

जिसने उन छोटी लड़कियों की कहानियों को कच्ची नींद में ही रोक दिया।

 

हवा अब उन गलियारों से गुज़रती है

तो उसे वह हँसी नहीं मिलती

जो फुसफुसा कर गुजर जाती थी।


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