गेंद के प्रसंग में (विकुशु को याद करते हुए)
(विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए युवा कवि अम्लानज्योति गोस्वामी ने यह कविता लिखी है। जो the wire में I entered Vinod Kumar Shukla poem शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यहां इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है।)
मैं एक कविता में दाख़िल हुआ
विनोद कुमार शुक्ल की,
खिड़की खुली थी
और भीतर एक दुनिया थी।
बचपन की क्रिकेट की गेंद ढूँढता,
वही गेंद जिसने एक बार
खिड़की का शीशा तोड़ा था,
जिसके शोर में घरों से लोग निकल आए थे,
और बच्चे भाग गए थे
गलियों की ओर।
अंदर, ठंडी नमी-सी मेज़ है,
किसी की आहट नहीं।
दीवारें छूते हुए मैं चलता हूँ,
घड़ी पुराना समय बता रही है।
वह बच्चा अब अमेरिका में नौकरी करता है,
एक हरे काग़ज़ की तलाश में,
जो उसे वहीं रखेगा हमेशा।
पिता धूप में चलते हुए
शाम में उतर रहे हैं,
पर कुछ रास्ता अभी बाकी है—
कहीं एक क्रिकेट मैच देखना होगा
धूल भरी सड़क पर,
जहाँ पुरानी खिड़कियाँ चरमराती हैं।
गेंद वहीं कहीं होगी—
किसी कोने में छिपी,
या बिस्तर के नीचे चुपचाप लुढ़की।
मैं बिस्तर खोजता हूँ—
अब वह नहीं है।
गेंद शायद रसोई में गई होगी,
जहाँ बर्तन कल की थकान में भरे हैं,
और हँसी की झंकार अब भी बची है।
हो सकता है गेंद बाहर आ गई हो,
एक खुले दरवाज़े से,
नाले के किनारे घास के बीच टिकी—
जहाँ जंगली पौधे फिर से बड़े हो रहे हैं।
मैं धीरे से बाहर निकला,
ध्यान से, कि कोई जाग न जाए।
पंक्तियों के बीच की खाई पार की
और पाया—
मैं फिर बाहर हूँ,
दुनिया के भीतर,
एक अल्पविराम लिए हुए।
प्रश्नचिह्न अभी भी मुझसे दूर है।
गेंद की जगह,
सिर्फ़ पन्ने पलटते हैं—
एक वर्तुल वर्ष
दूसरे में बदल जाता है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें