"मैं एक लेखक होने के साथ-साथ उतना ही रीडर (पाठक) भी हूँ।"
(प्रस्तुत साक्षात्कार एयर
इंडिया की मैगज़ीन NAMASTE.ai के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुआ
है। जो लेखक रस्किन रस्किन बॉन्ड से श्राबस्ती अनिंदिता मलिक की बातचीत पर आधारित है।
पिछ्ले सप्ताह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा में इसे पढ़ा था। मूल अंग्रेजी के साक्षात्कार
का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।)
91 साल की उम्र में भी रस्किन बॉन्ड लिखते जा रहे हैं, पढ़ते जा रहे हैं, और जिंदगी के छोटे-छोटे लम्हों में खुशी ढूंढ लेते हैं। वो भारत के सबसे ज़्यादा किताबें लिखने वाले लेखकों में से एक हैं, और आज भी उनकी लेखनी युवा है।
सवाल : नई किताब “अनदर डे इन लैंडौर (Another Day in
Landour) ” मुबारक हो! ये किस तरह की किताब है?
रस्किन बॉन्ड: शुक्रिया! ये तो एक रोज़नामा
या डायरी के पन्ने हैं—पहाड़ों पर मेरी ज़िंदगी, रोज़मर्रा के मशगूलात, और अब बुढ़ापे में आने वाले ख़यालात
के बारे में। ये चिंतन वाली डायरी है, जैसे खुद से दिल की बातें।
सवाल : इतने सालों तक लिखने की प्रेरणा कहाँ से आती रही?
रस्किन बॉन्ड : मुझे लगता है, मैंने लेखन
के लिए अपना उत्साह कभी नहीं खोया। और किताबों और साहित्य से प्यार के कारण मैं हमेशा
साहित्यिक दुनिया का हिस्सा बने रहना चाहता था। मैं तो स्वभाव से ही किताबें पसंद करने
वाला इंसान हूँ, पढ़ना बहुत पसंद है।
मैंने 1950 के दशक में लिखना शुरू किया — लगभग 1954 के आसपास फ्रीलांसिंग शुरू की, और तब से रुका नहीं। धीरे-धीरे मेरा पुस्तक-संग्रह बढ़ता गया। बचपन से ही डायरी
रखता था, और यही लेखन एक जीवनशैली बन गया। मैंने लगभग हर तरह
की विधा में लिखने की कोशिश की है — कविता, निबंध, कहानी, उपन्यास —
और अब भी कोशिश जारी है।
सवाल : आप आज भी हाथ से लिखते हैं?
रस्किन बॉन्ड : हाँ, बेशक। मैं आज भी
हाथ से लिखता हूँ, क्योंकि मैंने अपना ज़्यादातर जीवन हाथ से
लिखकर ही बिताया है। और मेरी लिखावट बहुत बुरी भी नहीं है (हँसते
हुए)। इसलिए मेरे प्रकाशकों को भी कोई दिक्कत नहीं होती।
सवाल : आपकी कहानियाँ तो पीढ़ियों से पढ़ी जा रही हैं और बहुत पसंद की जा रही हैं।
आप ऐसा कैसे करते हैं कि आपकी कहानियाँ इतनी कालातीत बन जाती हैं?
रस्किन बॉन्ड : ये सुनकर बहुत अच्छा लगता है। मैंने हमेशा युवा
और बुजुर्ग दोनों तक पहुँचने के लिए एक ही तरीके से लिखा है। मैं अपने लेखन के ज़रिए
उनके साथ कुछ साझा करना चाहता हूँ — जैसे कोई बातचीत हो रही हो।
सवाल : आप हर कहानी को इतना ताज़ा और प्रासंगिक कैसे रखते हैं?
रस्किन बॉन्ड : मैं लिखते समय सामान्य और स्वाभाविक बने रहने
की कोशिश करता हूँ। बहुत ज़्यादा साहित्यिक या अकादमिक नहीं होना चाहता, क्योंकि मेरा मक़सद पाठक से सीधे संवाद करना है। इसलिए मैं बस यूँ ही बात करता
चला जाता हूँ; कभी सब बिल्कुल साफ़ समझ में आ जाता है,
कभी थोड़ा उलझा भी रह जाता है, लेकिन मुझे लिखने
में हमेशा मज़ा आया है।
शायद यही वजह है कि मैं जितना लेखक हूँ, उतना ही पाठक भी हूँ। अपने पूरे जीवन में मैं
एक प्रगाढ़ पाठक रहा हूँ। मुझे किताबें बेहद पसंद हैं; अक्सर
मैं एक सप्ताह में दो‑तीन किताबें पढ़ लेता हूँ। अब नज़र बहुत
कमज़ोर हो गई है, फिर भी मैं खुद को किताबों, गानों और शब्दों से घिरा रखने की कोशिश करता हूँ, इसलिए
जितना हो सके, उतना पढ़ता रहता हूँ।
मैं आज भी हाथ से ही लिखता हूँ, क्योंकि ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा मैंने
इसी तरह लिखा है – और मेरी लिखावट भी काफ़ी अच्छी है
(हँसते हुए), इसलिए मेरे प्रकाशकों को कभी शिकायत
नहीं रहती।
सवाल : आपके दादाजी की कहानी के ज्वलंत विवरणों से लेकर एक खरगोश की कहानी तक,
आशा की भावना को अपनाते हुए—आप हमेशा अपने परिवेश
के एक उत्सुक पर्यवेक्षक रहे हैं। हमें रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे, अक्सर मनोरंजक, पहलुओं में प्रेरणा खोजने के बारे में
बताएं।
रस्किन बॉन्ड : सब कुछ महत्वपूर्ण होता है – ज़िंदगी की छोटी‑छोटी, बिल्कुल
साधारण लगने वाली चीज़ें भी।
उदाहरण के लिए, एक छोटी‑सी चींटी। मैंने
एक कहानी लिखी थी; वह कोई मशहूर उपन्यास नहीं, बस एक छोटी कहानी थी कि कैसे वह चींटी एक व्यस्त सड़क पार करते हुए शायद बीस
बार कुचलते‑कुचलते बच जाती है। लेकिन हर बार वह बच निकलती है,
क्योंकि रास्ते में एक पत्ता आ जाता है, एक तरह
का पत्तेदार पौधा जैसा सहारा।
फिर एक छोटा घोंघा सड़क पार करने आता है।
ऐसा लगता है कि वह भी कुचल जाएगा, लेकिन अंत तक वह भी बच ही जाता है – और मैं उसके बच जाने
पर उसके पक्ष में मुस्कुरा देता हूँ।
मैंने अपना जीवन, अपना बचपन और अपनी तमाम टिप्पणियाँ लिखकर सहेजी
हैं। हो सकता है कि आप इन्हें तुरंत किसी रचना में इस्तेमाल न कर पाएँ, लेकिन इन्हीं नोटों और अवलोकनों को आप बाद में किसी और रूप – कहानी, कविता या याद – में ज़रूर
बरत सकते हैं।
सवाल : वास्तव में, और आपने उन भावनाओं में से कुछ को इतनी मार्मिकता
से कैद किया है—चाहे वह बचपन की मासूमियत हो, परिवार हो, दोस्ती हो, पहला प्यार...
रस्किन बॉन्ड : यह सब कहीं न कहीं मेरे बचपन से ही जुड़ा हुआ
है। शुरुआती बरसों में मैं जामनगर में बड़ा हुआ, जहाँ मेरे पिता
काम करते थे; वहाँ चारों तरफ़ खूबसूरत बगीचे, पेड़ और फूल थे। बाद में देहरादून में अपनी दादी के साथ भी कुछ साल गुज़ारे,
उनके घर में भी एक बहुत सुंदर बगीचा था, तो मेरा
बचपन इन दोनों जगहों के बीच ही बीता।
किताबों की असली खुशी मुझे बोर्डिंग स्कूल
में मिली, वहीं मैं सचमुच का एक ‘किताबी कीड़ा’ बन गया। मैं अक्सर पीटी पीरियड और अतिरिक्त
होमवर्क से बचने की कोशिश करता, ताकि किसी कोने में चुपचाप बैठकर
पढ़ सकूँ।
मैं आज भी ज़्यादातर उन्हीं चीज़ों के बारे में लिखता और बात करता हूँ, जिन्होंने इस दुनिया को मेरे लिए दिलचस्प बनाया और जो अपने आप में कालातीत हैं। मुझे प्रकृति और लोग दोनों बहुत पसंद हैं—दरअसल हर इंसान अपने आप में एक कहानी है। शायद इसी वजह से मैं कभी कहानी के विचारों से खाली नहीं हुआ, क्योंकि दिलचस्प लोगों और किरदारों से मुलाक़ात चलती ही रहती है। मेरी ज़्यादातर कहानियाँ कथानक से ज़्यादा लोगों के बारे में होती हैं।
सवाल : आपकी बातों से साफ़ झलकता है कि प्रकृति के प्रति आपका गहरा प्रेम आपकी रचनाओं
में एक काव्यात्मक रूप लेकर उभरता है। आपने कहीं लिखा है कि “जीवित प्राणी हमेशा आपके लिए उपस्थित रहेंगे, और तब आप
कभी सचमुच अकेला महसूस नहीं करेंगे।
रस्किन बॉन्ड : (मुस्कुराते हैं) हाँ,
यह सुनकर अच्छा लगा कि आपको भी ऐसा महसूस होता है। देखिए, भले ही आप अकेले रह रहे हों, आप कभी भी बाहर निकलकर प्रकृति
के बीच टहल सकते हैं। आप उन तमाम चीज़ों में दिलचस्पी ले सकते हैं जो चुपचाप बढ़ती
और खिलती रहती हैं—अलग‑अलग तरह के पौधे,
पेड़, जंगली फूल, यहाँ तक
कि कीड़े‑मकोड़े और पक्षी भी।
मुझे पक्षी देखने वाले लोग बहुत संतुलित लगते
हैं; वे सुबह जल्दी उठते हैं, टहलने जाते हैं और अपने आस‑पास की प्राकृतिक दुनिया को
ध्यान से देखते हैं। यह बात मुझे उनके बारे में बेहद आकर्षक लगती है। और फिर,
एक पक्षी से ज़्यादा सुंदर और क्या हो सकता है? शायद सिर्फ़ एक तितली।
सवाल : क्या आप लैंडौर की अपनी सबसे प्यारी यादों में से एक को याद कर सकते हैं?
रस्किन बॉन्ड : ठीक है, यह उस समय की
बात है जब मैं पहली बार पहाड़ियों पर आया था—लगभग चालीस–पचास साल पहले। मैं देर शाम टहल रहा था, और चाँदनी से
भरी सड़क पर मैंने एक अकेली, जंगली लोमड़ी को चलते हुए देखा।
वह दृश्य इतना अद्भुत और सम्मोहक था कि उसके प्रभाव में मैंने उस पर एक छोटी‑सी कविता लिखी।
कल रात घर लौटते लौटते
सड़क के मोड़ पर
चाँदनी ने कंधा छूकर कहा –
“ज़रा ठहर…”
रौशन धूल सा बिखरा था चाँद,
और उसके बीच
एक तन्हा लोमड़ी
अपनी ही परछाईं के साथ
धीमे‑धीमे नाच रही थी।
सड़क नीचे को जाती थी,
वह भी चली गई उसी तरफ़ –
जैसे जानती हो
कि आज की पूरी रात
उसी के नाम लिखी है।
हवा चुप थी,
पेड़ अपनी साँस रोके बैठे थे,
बस रोशनी थी
जो हर चीज़ को
झूठ भी बनाती थी, सच भी।
मैं देर तक खड़ा रहा,
और जाने कब
अपने ही भीतर
सुबह की ओस में भीगती
एक तनहा लोमड़ी बनकर
अपनी जगह पर
हौले‑हौले नाचने लगा।
सवाल : नये लेखकों के लिये कोई नसीहत...!
रस्किन बॉन्ड : किसी भी युवा या संघर्ष कर रहे लेखक को जब भी मेरे पास सलाह चाहिए होती है, तो मैं सबसे पहले बस इतना कहता हूँ—एक नोटबुक ज़रूर रखिए। उसमें आप अपने विचार, भावनाएँ और रोज़मर्रा की छोटी‑बड़ी टिप्पणियाँ दर्ज कर सकते हैं। हो सकता है कि वे बातें तुरंत किसी कहानी या कविता में न बदलें, लेकिन समय के साथ वही नोट्स किसी और रूप में वापस लौटते हैं—किसी दृश्य, किसी किरदार या किसी पंक्ति के रूप में।
(सभी छायाचित्र : नमस्ते पत्रिका, एयर इंडिया)
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