चिल्ड्रेन चॉइस: परंपरा, शिल्प और सौंदर्यबोध का प्रश्न
लाइब्रेरी एजुकेटर्स के नाम एक खुला पत्र
दिसम्बर
महीने में आयोजित ‘पराग उत्सव में 'आदा पादा' कविता
को लगभग ७००० से अधिक बच्चों द्वारा 'चिल्ड्रेन चॉइस अवार्ड'
के लिये चुने जाने की घोषणा बाल-साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी घटना
है। बच्चों की सक्रिय
भागीदारी और उनकी सामूहिक सहमति का एक स्वर में गूँजना यह दर्शाता है कि हमारे समय
में बच्चों के पास चुनाव करने की शक्ति और अवसर, दोनों बढ़ रहे हैं।
पिछले
वर्ष की 'पराग
ऑनर लिस्ट' से चुने हुए कविता संग्रहों को जब
लाइब्रेरीज़ तक ले जाया गया, तब निश्चित रूप से आप सभी
का उन रचनाओं को प्रस्तुत करने का तरीका बच्चों की पसंद का एक मुख्य आधार बना होगा। यही बात बार-बार मेरे मन में भी आती रही है। क्योंकि उस सूची में शामिल अन्य कविता की किताबें भी किसी भी स्तर पर कमतर नहीं थीं—विशेष रूप से 'गप्पू गोला'
और 'कुछ आता न जाता' जैसी किताबें , जो अपने आप में अनूठी और शिल्प की
दृष्टि से अत्यंत मज़बूत थीं। पर यहाँ हमें ठहरकर यह सोचना चाहिये
कि क्या बच्चों का यह चुनाव पूरी तरह उनका अपना था? या फिर
इसमें हम बड़ों की पसंद, हमारे प्रस्तुतिकरण का ढंग, हमारी सोच और हमारे अनचाहे दखल का भी कोई असर रहा है?
यह
प्रश्न केवल एक पुरस्कार का नहीं है, बल्कि उस 'प्रक्रिया'
का है जिसके माध्यम से हम बच्चों के लिये साहित्य का चुनाव करते हैं। सोचियेगा, क्या लाइब्रेरियन
के रूप में हमारा किसी एक विशेष रचना की ओर अधिक झुकाव अन्य रचनाओं के साथ होने
वाले न्याय को प्रभावित कर गया? या कोई और वजहें रही होंगी। इस खुले पत्र का आशय किसी रचना को कमतर दिखाने का
कतई नहीं है। बस किसी रचना को देखने का समालोचनात्मक नज़रिया क्या होना चाहिये और
दूरगामी प्रभाव के लिये केवल आनंद नहीं बल्कि कविता के सौंदर्य को शामिल करना
क्यों आवश्यक है, उस ओर इशारा करने का है। यह नज़रिया मेरी
सीमित समझ से उपजा है, इसलिये इसे कहीं से कोई मानक नहीं
माना जाना चाहिये। अब चूँकि 'आदा पादा'
पुरस्कृत है, तो बात इसके हवाले से करने की
कोशिश करता हूँ।
पाचन : बाल-मनोविज्ञान का उजला पक्ष
बाल-मनोविज्ञान
के धरातल पर जब हम दृष्टि डालते हैं, तो 'आदा पादा'
जैसी रचनाएँ एक अत्यंत मज़बूत और अनिवार्य हस्तक्षेप के रूप में दिखायी देती हैं। यह उस कृत्रिम 'बनावटी
सभ्यता' के विरुद्ध एक वैचारिक शंखनाद है जिसे वयस्कों की
दुनिया ने बालकों पर थोप दिया है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर बाल-संसार
उस आदिम शुचिता से संचालित होता है, जहाँ सत्य
और सहजता के बीच कोई पर्दा नहीं होता।
समाज
ने जिन प्राकृतिक क्रियाओं को 'अशिष्ट' या 'गंदा' कहकर हाशिये पर रखा है, बालक उन्हें एक निश्छल कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं। जब ऐसी
कविताएँ पुस्तकालयों के माध्यम से बाल-संसार में पहुँचती हैं, तो वे एक प्रकार की 'मनोवैज्ञानिक मुक्ति' का द्वार खोलती हैं। बालक को यह बोध होता है कि उसकी वह सहजता,
जिसे घर या विद्यालय में 'अनुशासन' के नाम पर दबाया गया था, उसे
अब साहित्य के पावन प्रांगण में 'वैधता' दी गयी है। यह स्वीकृति केवल हास्य के लिये
नहीं, अपितु बालक के आत्म-गौरव और आत्मविश्वास के लिये
अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गयी है।
'पाचन' जैसे विषय बालक को यह विश्वास दिलाते हैं कि साहित्य कोई पराई दुनिया नहीं, अपितु उसके अपने अस्तित्व का ही विस्तार है। जब शारीरिक अवस्थाएँ कविता का
रूप लेती हैं, तो बालक के भीतर का 'अलगाव' तिरोहित हो जाता है और साहित्य के
साथ एक अटूट 'आत्मीय जुड़ाव' बन जाता है।
लोक-परंपरा का विस्मरण और
आरोपित नवीनता
यहीं
पर एक लाइब्रेरी एजुकेटर के रूप में आपको सूक्ष्म विश्लेषण की आवश्यकता है। जब हम 'आदा पादा' के माध्यम से वर्जनाओं को तोड़ने का दावा करते हैं, तो हम प्रायः अपनी उस समृद्ध लोक-परंपरा को विस्मृत कर देते हैं जहाँ ऐसे
खेल-गीत सदियों से जीवित रहे हैं। यह कोई नितांत नवीन भाषायी
आविष्कार नहीं है। बालक अपनी मौखिक परंपरा में इसे बहुत पुराने समय से इस्तेमाल करते रहे हैं।
आदा
पादा नून सवादा
किसने
पादा किसने पादा
राजा
जी की घोड़ी ने पादा....
इस खेल गीत के ऐसे ही न जाने कितने वर्ज़न हमारे बीच हमेशा से रहे हैं, जिसमें बच्चे मुठ्ठी बनाकर हवा में उछालते थे ताकि बदबूदार गंध हवा में विलीन हो जाये। इसे स्कूल में, घर में, बड़ों के सामने हर जगह ही तो खेला जाता रहा है।
अतः, इसे 'वर्जनाओं पर प्रहार' करने वाली कोई नवीन घटना मानना
एक सीमा तक 'आरोपित' प्रतीत होता है। जो बात लोक-जीवन में पहले से ही सहज रूप में
स्वीकार्य थी, उसे साहित्य में लाकर ‘नवीन प्रयोग, सहजता या आम जीवन की चीजों को साहित्य
में शामिल करना’ कहना संदेहास्पद हो जाता है। बाल साहित्य
में समस्या विषयों की कमी नहीं, अपितु उन विषयों को 'साहित्यिक गरिमा' के साथ पिरोने की रही है। केवल आनंद के लिये लोक-गीत पर्याप्त हैं, पर लिखित साहित्य के रूप में हमें 'कला' की माँग भी करनी होगी।
शिल्पगत सतहीपन और भाषायी अकाल
साहित्य
का प्रथम संस्कार उसकी भाषा है। क्या हम केवल क्षणिक आनंद और लोकप्रियता के आधार
पर शिल्प की उपेक्षा कर सकते हैं? 'आदा पादा' में भाषा का वह सौंदर्य
या प्रारूप लुप्त है जो बालक की कल्पनाशक्ति को पंख दे सके। इसमें एक ही
क्रिया ‘पादे’ की निरंतर आवृत्ति से एक प्रकार का 'शिल्पगत
सतहीपन' उभरता है। अच्छी बाल-कविता वह है जो सरल तो हो,
पर जिसकी सादगी में भी अर्थ की हज़ारों परतें छिपी हों।
यहाँ
शब्द-भंडार इतना सीमित रखा गया है कि वह पाठक को भाषायी रूप से
समृद्ध करने के बजाय एक सीमित घेरे में कैद कर देता है। जब क्रियाओं के विविध रूप नहीं पिरोये जाते, तो रचना एक यांत्रिक शोर बनकर रह जाती है। दूरगामी
प्रभाव के लिये शब्दों की विविधता और सौंदर्यबोध का होना अनिवार्य है।
वैचारिक प्रगति और एजेंसी का
अभाव
एक अच्छी
कविता पाठक को एक बिंदु से उठाकर दूसरे उच्चतर बिंदु पर ले जाती है। वैश्विक
बाल-साहित्य में यदि वर्जित विषयों पर बात हुयी है, तो वह एक सूक्ष्म और
जादुई यात्रा के माध्यम से पहुँची है। 'आदा
पादा' में वैचारिक प्रगति का नितांत अभाव है। यह जहाँ से
प्रारंभ हुई, वहीं एक वृत्त बनाकर समाप्त हो गयी।
इस
कविता की अंतिम पंक्तियों को देखते हैं
जब
जब पाद उठे तो पादो
बिना
शरम के पादो
पाद
में पाद तुम्हारा हो
अपनी
पहचान बना दो...
इन
पंक्तियों को पढ़ते हुए इसके पाठक की भूमिका समझने की कोशिश करता रहा कि उसे किस
तरह देखा गया है। जिस सहजता और स्वतंत्रता की बात बालहित में की जाती है, या बच्चे कैसे होते
हैं के सवाल में ‘कौन सा बच्चा?’ जैसे
सवाल उठाये जाते हैं, क्या इस कविता में यह बात सुनिश्चित
होती है? यहाँ स्पष्टता के साथ कहना जरूरी है कि आधुनिक बाल-साहित्य में बच्चा अब
केवल 'महज़ पाठक' या 'अनुगामी' नहीं रहा। किन्तु इस कविता का स्वर
आदेशात्मक है। यहाँ बच्चों की दुनिया को केवल आदेश दिये गये हैं, उन्हें ऐसी स्थितियों में नहीं रखा गया जहाँ वे स्वयं
अपनी शरारत या अपनी पहचान गढ़ सकें। इसके अतिरिक्त, इसमें
समावेशिता (Inclusivity) का भी अभाव है। विविध शारीरिक
चुनौतियों वाले बालकों की विशिष्ट अनुभूतियों को इस 'प्राकृतिक
क्रिया' के साथ जोड़कर नहीं देख़ा गया। अलग-अलग जानवर
चरित्रों के साथ इस क्रिया को लिखा जरूर गया है, पर उसका
उद्देश्य निरा हास्यबोध ही है।
सौंदर्य का महत्व और दूरगामी
प्रभाव
साथियों, केवल आनंद के लिये पढ़ी
गयी कविता कुछ समय बाद विस्मृत हो जाती है, किन्तु जिस कविता में 'सौंदर्य' और 'शिल्प' का सामंजस्य होता
है, वह बालक के भीतर भाषा के प्रति एक स्थाई प्रेम और
संस्कार जगाती है। 'गप्पू गोला' और ‘कुछ आता न जाता’ जैसी
किताबें इसीलिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे आनंद के साथ-साथ कल्पना का एक नया
क्षितिज खोलती हैं। यदि हम केवल तात्कालिक हँसी को पसंद का आधार बनायेंगे, तो हम भविष्य में एक सच्चा पाठक
तैयार करने के अपने मुख्य उद्देश्य से भटक जायेंगे।
एक निवेदन
किसी
भी रचना की महानता उसके केवल 'महज़ नवीनता' में नहीं, बल्कि
उसकी 'कला' पक्ष में भी होती है। यदि ‘आदा पादा’ में क्रियाओं के और विविध रूप दिये जाते, तो बालकों की भाषायी समझ और परिष्कृत होती। केवल दैनिक अनुभवों
का सूचीकरण कर देना ही साहित्य नहीं है।
जब इस
तरह की कवितायें 'साहित्य' के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, तो उनसे उस कलात्मक परिपक्वता और
भाषायी संस्कार की अपेक्षा की जाती है जो अधिकांश में प्रायः लुप्त दिखायी देती है। अतः, लाइब्रेरी
एजुकेटर्स को चाहिये कि वे चुनाव की इस प्रक्रिया में केवल 'पसंद'
को नहीं, बल्कि 'कविता
के सौंदर्य' को भी महत्व दें। इस रचना को नवीनता
और दैनिक अनुभवों को शामिल करने जैसे तर्कों के बजाय, लोक-परंपरा
के एक सहज विस्तार के रूप में देखना ही अधिक न्यायसंगत होगा। हमें बच्चों को ऐसे साहित्य की ओर ले जाना है, जो उन्हें हँसाने के साथ-साथ भाषा और
शिल्प की ऊँचाइयों से भी परिचित कराये। पुस्तकालय केवल सूचना के केंद्र नहीं हैं,
वे सौंदर्यबोध और रचनात्मकता के घर भी होने चाहिये।
इसलिये हमें यह प्रश्न अपने आप से बार-बार पूछना होगा—क्या
हम बच्चों को वही दे रहे हैं जो वे 'चुनना' चाहते हैं,
या हम उन्हें वह दे रहे हैं जिसे 'चुनने'
के लिये हमने उन्हें तैयार किया है? 'गप्पू
गोला' और 'कुछ आता न जाता' जैसी किताबों को दोबारा खोलिये और देखिये कि क्या उनकी शांति में 'आदा पादा' के शोर से अधिक गहरा सच तो नहीं छिपा था?
शुक्रिया!
आपका एक साथी
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