आवाज़ों के आँगन में लौटता बचपन

 


एल्बम का नाम - बैक टू बचपन 

संगीतकार - चिन्मयी और जोएल 


दिसम्बर का महीना था। वही जो अभी-अभी गया है। मैं एलेक्सा पर गीत टटोल रहा था। अचानक स्पॉटीफाई पर कुछ कविताओं के ऑडियो सुनने को मिले।  मानों कानों में सोंधी-सी आवाज़ें भर गयी हों, जैसे बरसों पुरानी धूल जमी किसी स्लेट पर गीले कपड़े से किसी ने 'बचपन' लिख दिया हो।  धीरे-धीरे मैं आठ कवितायें सुन गया। पहली कविता पेड़ तुम दर्ज़ीपहले ही वीडियो के रूप में सबकी जुबान पर चढ़ गया है। सारे गीतों से गुजरते हुए मुझे लगा कि काव्यराग का यह ऑडियो एल्बम, ‘बैक टू बचपन’, दरअसल हमारी स्मृतियों के उस बक्से की चाबी है जिसे हम बड़ी उम्र की आपाधापी में कहीं रखकर भूल गये थे। इसमें कविताएँ केवल गायी नहीं गयीं, बल्कि वे सुरों की उँगली पकड़कर हमारे घर की देहरी पर आयी हैं।

इस एल्बम की सबसे बड़ी ताकत इसकी कविताओं का वह 'सादगी भरा भारीपन' है, जो बच्चों के लिये जितना सहज है, बड़ों के लिये उतना ही गहरा। गोपाल कृष्ण कौल, नरेश सक्सेना, श्याम सुशील, सुशील शुक्ल, स्वानंद किरकिरे, वरूण ग्रोवर और विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवियों ने शब्दों को ऐसे बरता है, जैसे कोई दादी पुराने कपड़ों की कतरनों से एक नयी और गरम रजाई बनाती हो।

यहाँ "पेड़ तुम दर्जी" में प्रकृति की कारीगरी का वह कोमल पक्ष उकेरा गया है, जहाँ एक पेड़ चुपचाप घोंसले सिलने का काम करता है। "कुदरत की रीलें" हमें भागना छोड़कर थोड़ी देर घास पर लेटने का आग्रह करती हैं। इन कविताओं की भाषा में जो दोहराव है, वह बच्चों के मन में वैसे ही बैठता है जैसे बारिश के बाद मिट्टी की महक।

चिन्मयी त्रिपाठी और जोएल मुखर्जी ने इस एल्बम के संगीत को बहुत 'कम' रखा है, और यही इसका 'ज्यादा' होना है। यहाँ संगीत शब्दों के ऊपर नहीं चढ़ता, बल्कि उनके नीचे एक महीन मलमल की तरह बिछा हुआ दिखायी देता है। बाँसुरी की वह तान, जो हवा जैसी सुनायी देती है, और गिटार की वह गूँज, जो किसी के चलने की आहट जैसी लगती है, कानों में एक सुकून भर देती है। जहाँ 'पहली बूँद' में एक किस्म का ठहराव और विस्मय है, जिसे जोएल ने बहुत सुंदर तरीके से गाया है। उनके आवाज़ की सॉफ्टनेस मन को छू जाती है। ऐसा ही कमाल उन्होंने ठाँव-ठाँव घूमा में किया है। वहीं नरेश सक्सेना की कविता 'गोल करेंगे' सुनते हुए महसूस होता है कि इस गीत की ताल में वह धड़कन है जो मैदान में दौड़ते बच्चों के पाँवों से निकलती है।

आलाप, अनिश्का, मेहेरांश और निवेदिता—इन छोटे बच्चों के स्वर इस एल्बम की सबसे सच्ची गवाही देते हैं। इन स्वरों में वह बनावटी चमक नहीं है जो अक्सर बाज़ार की माँग पर चढ़ायी जाती है। उनकी आवाज़ों की वह महीन-सी थरथराहट और वह मासूम-सी बेसुरीपन ही इस एल्बम को 'बचपन' बनाती है।

चिन्मयी के स्वर इन बच्चों के लिये किसी बरगद की छाँव जैसे साबित हुये हैं, जो उन्हें संभालते भी हैं और सुरीला आधार भी प्रदान करते हैं। यहाँ समूह-गान हमें उस गली की याद दिलाता है जहाँ हम सब मिलकर उँचे स्वर में गाया (या चिल्लाया) करते थे।

यह पूरा ऑडियो एल्बम एक 'ऑडियो-पिक्चर' जैसा है। जब हम सुनते हैं कि पेंसिल, रबर और शार्पनर दोस्त बन गये हैं, तो आँखों के सामने उनकी एक दुनिया बनने लगती है। यहाँ पहाड़ अजब हैं और पतंगें हरी हैं, पर उनके साथ जो कल्पना की उड़ान जोड़ी गयी है, वह अवश्य ही ४ से १२ साल के बच्चों के भीतर जिज्ञासा के नये द्वार खोलेगी। भाषा और सुरों का मेल इतना सुसंस्कृत है कि यह बच्चों के कानों को शोर की आदत नहीं, बल्कि 'सुनने' की तमीज़ सिखाता है।

आज के दौर में जब हर तरफ शोर का साम्राज्य है, ‘बैक टू बचपन’ एक ज़रूरी हस्तक्षेप की तरह आया है। यह बच्चों को जल्दी बड़ा होने की दौड़ से बाहर निकालता है। यह उन्हें महसूस कराता है कि छोटी-छोटी चीज़ों में भी जादू होता है—चाहे वह पानी की एक बूँद हो या एक पुरानी पेंसिल।

इसलिये मेरे लिये यह एल्बम महज़ सुरों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी जड़ों की ओर वापसी की एक 'लिखन्नी यात्रा' है। इसमें कविता खेल बनी है और संगीत एक मीठी-सी बात। इसे सुनना वैसा ही है जैसे किसी पुरानी किताब के बीच दबी सूखी पत्ती को फिर से छू लेना।


इसे यहाँ सुना जा सकता है - बैक टू बचपन

 


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