गेंद के प्रसंग में (विकुशु को याद करते हुए)
(विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए युवा कवि अम्लानज्योति गोस्वामी ने यह कविता लिखी है। जो the wire में I entered Vinod Kumar Shukla poem शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यहां इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है।) मैं एक कविता में दाख़िल हुआ विनोद कुमार शुक्ल की, खिड़की खुली थी और भीतर एक दुनिया थी। बचपन की क्रिकेट की गेंद ढूँढता, वही गेंद जिसने एक बार खिड़की का शीशा तोड़ा था, जिसके शोर में घरों से लोग निकल आए थे, और बच्चे भाग गए थे गलियों की ओर। अंदर, ठंडी नमी-सी मेज़ है, किसी की आहट नहीं। दीवारें छूते हुए मैं चलता हूँ, घड़ी पुराना समय बता रही है। वह बच्चा अब अमेरिका में नौकरी करता है, एक हरे काग़ज़ की तलाश में, जो उसे वहीं रखेगा हमेशा। पिता धूप में चलते हुए शाम में उतर रहे हैं, पर कुछ रास्ता अभी बाकी है— कहीं एक क्रिकेट मैच देखना होगा धूल भरी ...