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चिल्ड्रेन चॉइस: परंपरा, शिल्प और सौंदर्यबोध का प्रश्न

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  लाइब्रेरी एजुकेटर्स के नाम एक खुला पत्र प्रिय लाइब्रेरी एजुकेटर्स साथियों , दिसम्बर महीने में आयोजित ‘ पराग उत्सव में ' आदा पादा ' कविता को लगभग ७००० से अधिक बच्चों द्वारा ' चिल्ड्रेन चॉइस अवार्ड ' के लिये चुने जाने की घोषणा बाल-साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी घटना है ।   बच्चों की सक्रिय भागीदारी और उनकी सामूहिक सहमति का एक स्वर में गूँजना यह दर्शाता है कि हमारे समय में बच्चों के पास चुनाव करने की शक्ति और अवसर , दोनों बढ़ रहे हैं । पिछले वर्ष की ' पराग ऑनर लिस्ट ' से चुने हुए कविता संग्रहों को जब लाइब्रेरीज़ तक ले जाया गया , तब निश्चित रूप से आप सभी का उन रचनाओं को प्रस्तुत करने का तरीका बच्चों की पसंद का एक मुख्य आधार बना होगा । यही बात बार-बार मेरे मन में भी आती रही है । क्योंकि उस सूची में शामिल अन्य कविता की किताबें  भी किसी भी स्तर पर कमतर नहीं थीं — विशेष रूप से ' गप्पू गोला ' और ' कुछ आता न जाता ' जैसी किताबें , जो अपने आप में अनूठी और शिल्प की दृष्टि से अत्यंत मज़बूत थीं । पर यहाँ हमें ठहरकर यह सोचना चाहिये कि क्या बच्चों का यह चुना...

आवाज़ों के आँगन में लौटता बचपन

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  एल्बम का नाम - बैक टू बचपन  संगीतकार - चिन्मयी और जोएल  दिसम्बर का महीना था। वही जो अभी-अभी गया है। मैं एलेक्सा पर गीत टटोल रहा था। अचानक स्पॉटीफाई पर कुछ कविताओं के ऑडियो सुनने को मिले।   मानों कानों में सोंधी-सी आवाज़ें भर गयी हों , जैसे बरसों पुरानी धूल जमी किसी स्लेट पर गीले कपड़े से किसी ने ' बचपन ' लिख दिया हो।   धीरे-धीरे मैं आठ कवितायें सुन गया। पहली कविता ‘ पेड़ तुम दर्ज़ी ’ पहले ही वीडियो के रूप में सबकी जुबान पर चढ़ गया है। सारे गीतों से गुजरते हुए मुझे लगा कि काव्यराग का यह ऑडियो एल्बम , ‘ बैक टू बचपन’ , दरअसल हमारी स्मृतियों के उस बक्से की चाबी है जिसे हम बड़ी उम्र की आपाधापी में कहीं रखकर भूल गये थे। इसमें कविताएँ केवल गायी नहीं गयीं , बल्कि वे सुरों की उँगली पकड़कर हमारे घर की देहरी पर आयी हैं। इस एल्बम की सबसे बड़ी ताकत इसकी कविताओं का वह ' सादगी भरा भारीपन ' है , जो बच्चों के लिये जितना सहज है , बड़ों के लिये उतना ही गहरा। गोपाल कृष्ण कौल , नरेश सक्सेना , श्याम सुशील , सुशील शुक्ल , स्वानंद किरकिरे, वरूण ग्रोवर और विनोद कुमार शुक्ल जैसे कवियों ने शब्...