चिल्ड्रेन चॉइस: परंपरा, शिल्प और सौंदर्यबोध का प्रश्न
लाइब्रेरी एजुकेटर्स के नाम एक खुला पत्र प्रिय लाइब्रेरी एजुकेटर्स साथियों , दिसम्बर महीने में आयोजित ‘ पराग उत्सव में ' आदा पादा ' कविता को लगभग ७००० से अधिक बच्चों द्वारा ' चिल्ड्रेन चॉइस अवार्ड ' के लिये चुने जाने की घोषणा बाल-साहित्य के क्षेत्र में एक बड़ी घटना है । बच्चों की सक्रिय भागीदारी और उनकी सामूहिक सहमति का एक स्वर में गूँजना यह दर्शाता है कि हमारे समय में बच्चों के पास चुनाव करने की शक्ति और अवसर , दोनों बढ़ रहे हैं । पिछले वर्ष की ' पराग ऑनर लिस्ट ' से चुने हुए कविता संग्रहों को जब लाइब्रेरीज़ तक ले जाया गया , तब निश्चित रूप से आप सभी का उन रचनाओं को प्रस्तुत करने का तरीका बच्चों की पसंद का एक मुख्य आधार बना होगा । यही बात बार-बार मेरे मन में भी आती रही है । क्योंकि उस सूची में शामिल अन्य कविता की किताबें भी किसी भी स्तर पर कमतर नहीं थीं — विशेष रूप से ' गप्पू गोला ' और ' कुछ आता न जाता ' जैसी किताबें , जो अपने आप में अनूठी और शिल्प की दृष्टि से अत्यंत मज़बूत थीं । पर यहाँ हमें ठहरकर यह सोचना चाहिये कि क्या बच्चों का यह चुना...