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गेंद के प्रसंग में (विकुशु को याद करते हुए)

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(विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए युवा कवि अम्लानज्योति गोस्वामी ने यह कविता लिखी है। जो the wire में I entered Vinod Kumar Shukla poem शीर्षक से प्रकाशित हुई है। यहां इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है।)  मैं एक कविता में दाख़िल हुआ   विनोद कुमार शुक्ल की,   खिड़की खुली थी   और भीतर एक दुनिया थी।   बचपन की क्रिकेट की गेंद ढूँढता,   वही गेंद जिसने एक बार   खिड़की का शीशा तोड़ा था,   जिसके शोर में घरों से लोग निकल आए थे,   और बच्चे भाग गए थे   गलियों की ओर।   अंदर, ठंडी नमी-सी मेज़ है,   किसी की आहट नहीं।   दीवारें छूते हुए मैं चलता हूँ,   घड़ी पुराना समय बता रही है।   वह बच्चा अब अमेरिका में नौकरी करता है,   एक हरे काग़ज़ की तलाश में,   जो उसे वहीं रखेगा हमेशा।   पिता धूप में चलते हुए   शाम में उतर रहे हैं,   पर कुछ रास्ता अभी बाकी है—   कहीं एक क्रिकेट मैच देखना होगा   धूल भरी ...

"मैं एक लेखक होने के साथ-साथ उतना ही रीडर (पाठक) भी हूँ।"

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( प्रस्तुत साक्षात्कार एयर इंडिया की मैगज़ीन NAMASTE.ai के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुआ है। जो लेखक रस्किन रस्किन बॉन्ड से श्राबस्ती अनिंदिता मलिक की बातचीत पर आधारित है। पिछ्ले सप्ताह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा में इसे पढ़ा था। मूल अंग्रेजी के साक्षात्कार का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है। ) 91 साल की उम्र में भी रस्किन बॉन्ड लिखते जा रहे हैं , पढ़ते जा रहे हैं , और जिंदगी के छोटे - छोटे लम्हों में खुशी ढूंढ लेते हैं। वो भारत के सबसे ज़्यादा किताबें लिखने वाले लेखकों में से एक हैं , और आज भी उनकी लेखनी युवा है। सवाल : नई किताब “ अनदर डे इन लैंडौर (Another Day in Landour) ” मुबारक हो ! ये किस तरह की किताब है ? रस्किन बॉन्ड : शुक्रिया ! ये तो एक रोज़नामा या डायरी के पन्ने हैं — पहाड़ों पर मेरी ज़िंदगी , रोज़मर्रा के मशगूलात , और अब बुढ़ापे में आने वाले ख़यालात के बारे में। ये चिंतन वाली डायरी है , जैसे खुद से दिल की बातें। सवाल  : इतने सालों तक लिखने की प्रेरणा कहाँ से आती रही ? रस्किन बॉन्ड  : मुझे लगता है , मैंने लेखन के लिए अपना उत्साह कभी नहीं खोया। और किताबों और साहित्य स...

जिसने मिलेनियल्स के बचपन में रंग भरे

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  जिसने मिलेनियल्स के बचपन में रंग भरे   आज सुबह हुई थी जैसे होती है सुबह रोज़   मेट्रो भी अपनी रफ्तार में थी पर मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर एक खबर चमकी उस खबर ने सहसा गुजरते समय को थाम लिया जैसे घड़ी की टिक-टिक एक पल को भूल गई हो वो चला गया जिसने हमारे बचपन में चटख रंग भरे थे , जब बचपन रंगों से भरा होता है ,   तो वह सिर्फ़ बचपन नहीं रहता वह तो जादू हो जाता है।   सहसा महसूस हुआ , आँखों में नमी थी   मेट्रो की खिड़की से गुजरता शहर धुंधला रहा था शायद मेरी उदासी शहर में उतर आई थी और फिर यादें लौट आईं , जैसे कोई पुरानी धुन बज उठी हो    रविवार की वो सुबहें जब दूरदर्शन—उस दौर का एकमात्र टीवी चैनल होता था जब सफ़ेद-श्याम पर्दे पर ‘चल मेरी लूना’ की चुलबुली आवाज़ गूँजती थी तब हम बच्चे ‘साइकिल की सैर’ सपने में देखते थे   । ‘ मिले सुर मेरा तुम्हारा’ तो जैसे जादू बुनता था हम गुनगुनाते थे , कई-कई बार बेतरह जैसे कोई अनकहा नेशनल एंथम हो हमारा तब कौन सोचता था कि इनको रचने वाला एक आदमी है ? वह आदमी , जो हमारे बच...

बच्चों के पुस्तकालय: वैश्विक रुझान और बदलता स्वरूप

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(पिछ्ले सप्ताह कोटा (राजस्थान) में 'बाल पुस्तकालय' की एक कार्यशाला में था। वहाँ 'बाल पुस्तकालय के वैश्विक रुझानों पर एक सत्र में बातचीत हुई। उसी बातचीत पर आधारित एक नोट्स यहाँ साझा कर रहा हूँ।)  आज के समय में बच्चों के पुस्तकालय सिर्फ किताबों का भंडार नहीं रहे , बल्कि वे एक ऐसे केंद्र के रूप में उभर रहे हैं , जहाँ बच्चे , उनके परिवार और समुदाय के लोग एक साथ आकर सीखने , रचनात्मकता और आधुनिक कौशलों का विकास कर सकते हैं। ये पुस्तकालय अब केवल किताबें पढ़ने की जगह नहीं हैं , बल्कि ये बच्चों के बौद्धिक , सामाजिक और डिजिटल विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आइए , हम आज के बच्चों के पुस्तकालयों में देखे जा रहे वैश्विक रुझानों को समझें। पुस्तकालयों का नया रूप: खेल और सीखने का मेल पहले पुस्तकालय शांत जगह हुआ करते थे , जहाँ बच्चे सिर्फ किताबें पढ़ने आते थे। लेकिन अब ये जगहें रंग-बिरंगी , जीवंत और बच्चों के लिए आकर्षक बन गई हैं। आज के पुस्तकालयों को इस तरह डिज़ाइन किया जा रहा है कि बच्चे खेल-खेल में सीख सकें। खेल-खेल में सीखने की जगह: पुस्तकालयों में अब कहानी सुनाने के लि...